RbiSearchHeader

Press escape key to go back

पिछली खोज

पृष्ठ
भारतीय रिज़र्व बैंक की आधिकारिक वेबसाइट

Notification Marquee

आरबीआई की घोषणाएं
आरबीआई की घोषणाएं

RbiAnnouncementWeb

RBI Announcements
RBI Announcements

असेट प्रकाशक

135052721

बुनियादी संरचना क्षेत्र और महत्‍वपूर्ण उद्योगों के लिए दीर्घावधि परियोजना ऋणों की लचीली संरचना

आरबीआई/2014-15/126
बैंपविवि. सं. बीपी. बीसी. 24/21.04.132/2014-15

15 जुलाई 2014

अध्‍यक्ष एवं प्रबंध निदेशक/मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी
सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक
(स्‍थानीय क्षेत्र बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर)

महोदय

बुनियादी संरचना क्षेत्र और महत्‍वपूर्ण उद्योगों के लिए
दीर्घावधि परियोजना ऋणों की लचीली संरचना

पिछले दशक के दौरान वाणिज्यिक बैंक बुनियादी संरचना और महत्‍वपूर्ण उद्योगों की परियोजनाओं के दीर्घावधि ऋण वित्‍तपोषण के मुख्‍य स्रोत बन गए हैं। सुदीर्घ उत्‍पादन पूर्व अवधि के और वृहत पूंजी निवेश बुनियादी संरचना और महत्‍वपूर्ण उद्योगों की विशेषता है। ऐसे परियोजना ऋणों की दीर्घ परिपक्‍वता अवधि में शुरुआती निर्माण काल तथा आस्ति का आर्थिक जीवन काल/अंतर्निहित रियायत अवधि निहित है (सामान्‍यतः 25-30 वर्ष)। ऐसे दीर्घ उत्‍पादन पूर्व अवधि वाले ऋणों की समस्‍या-रहित चुकौती सुनिश्चित करने के लिए उनकी चुकौती अवधि कुछ हद तक उस अवधि के अनुरूप होनी चाहिए जिसमें आस्ति के कारण नकद प्रवाह हो रहा हो।

2. हमें बैंकों से अभ्‍यावेदन मिलते रहे हैं कि आस्ति-देयता असंतुलन की समस्‍या के कारण वे ऐसे दीर्घावधि वित्‍तपोषण उपलब्‍ध कराने में असमर्थ हैं। अपने आस्ति-देयता असंतुलन पर काबू पाने के लिए वे अपने वित्‍तपोषण को निरपवाद रूप से अधिकतम 12-15 वर्ष की अवधि तक ही सीमित रखते हैं। प्रारंभिक निर्माण काल और चुकौती स्‍थगन को हिसाब में लेने के बाद बैंक ऋण की चुकौती 10-12 वर्ष की कम अवधि में सीमित की जाती है (जिसके परिणामस्‍वरूप ऋण की किस्‍तें उच्‍चतर होती हैं), जिससे न केवल परियोजना की अर्थक्षमता पर दबाव पड़ता है, बल्कि आगे निवेश के लिए आंतरिक कमाई से नई इक्विटी पैदा करने की प्रवर्तकों की क्षमता भी बाधित होती है। इसका प्रभाव यह भी हो सकता है कि ऋण की चुकौती के लिए अधिक नकद प्रवाह उत्‍पन्‍न करना सुनिश्चित करने के लिए बुनियादी संरचना परियोजनाओं के मामले में उच्‍चतर उपभोक्‍ता प्रभार लगाए जाएं। इन कारकों के परिणामस्‍वरूप कुछ दीर्घावधि परियोजनाओं को परियोजना ऋण चुकाने में कठिनाई/दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

3. इन समस्‍याओं से उबरने के लिए बैंकों ने अनुरोध किया है कि उन्‍हें इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और महत्‍वपूर्ण उद्योगों के क्षेत्रों में परियोजना के आर्थिक जीवन काल या रियायती अवधि के आधार पर परियोजना ऋणों के लिए दीर्घतर परिशोधन अवधि, जैसे 25 वर्ष नियत करने तथा आवधिक, जैसे प्रत्‍येक 5 वर्ष में पुनर्वित्‍त करने की अनुमति दी जाए। बैंकों ने बताया है कि :

  1. इससे प्रारंभिक वर्षों में नकद प्रवाह पर दबाव को दूर करके बुनियादी संरचना/महत्‍वपूर्ण उद्योग क्षेत्र की परियोजनाओं की दीर्घावधि व्‍यवहार्यता सुनिश्चित होगी;

  2. वे आस्ति देयता प्रबंधन (एएलएम) मुद्दे से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए बिना ऐसी परियोजनाओं को वित्‍त प्रदान कर सकेंगे;

  3. पुनर्रचना करने की आवश्‍यकता (सामान्‍यतः 10-12 वर्ष की ऋण परिपक्‍वता अवधि के परिणामस्‍वरूप शुरुआती दबावपूर्ण नकद प्रवाह के कारण) कम हो जाएगी, जिससे बैंक इन परियोजना ऋणों को दोबारा वित्‍त प्रदान/पुनर्वित्‍तीयन कर सकेंगे;

  4. वे बैंक की एकल/सामूहिक उधारकर्ता अथवा क्षेत्रवार एक्‍सपोजर सीमा के आधार पर ऐसी परियोजनाओं के जीवन चक्र के विभिन्‍न स्‍तरों पर एक्‍सपोजर को छोड़ सकते हैं या ले सकते हैं;

  5. परियोजना जोखिम में कमी और पुनर्वित्‍तीयन के विकल्‍प उपलब्‍ध होने के कारण इन परियोजनाओं की रेटिंग में ऊर्ध्‍वमुखी सुधार होगा, जिससे बैंकों की पूंजी अपेक्षाओं में भी कमी आएगी और ऐसे पुनर्वित्‍तपोषण के आधार पर किसी भी चरण में प्रवर्तक हेतु कार्पोरेट बांड बाजार में प्रवेश कर सकेंगे।

4. बैंकों द्वारा यह सुझाव भी दिया गया है कि बुनियादी संरचना/महत्‍वपूर्ण उद्योगों को दीर्घ परिपक्‍वता, जैसे 25 वर्ष वाले ऋणों को निम्‍नानुसार संरचित किया जा सकता हैः

  1. परियोजना की मूलभूत व्‍यवहार्यता सभी अपेक्षित वित्‍तीय और वित्‍तेतर मापदंडों के आधार पर स्‍थापित की जाएगी, विशेषतः ब्‍याज कवरेज अनुपात (ईबीआईडीटीए/ब्‍याज का बड़ा भुगतान (payout) जिसमें ऋण चुकाने की क्षमता और ऋण की अवधि के दौरान चुकौती करने के सामर्थ्‍य का उल्‍लेख किया गया हो।

  2. ऋण की दीर्घतर परिशोधन अवधि, जैसे 25 वर्ष (परियोजना का लाभप्रद जीवनकाल/रियायती अवधि के भीतर) में परिशोधन (परिशोधन कार्यक्रम) के साथ शेष ऋण का आवधिक पुनर्वित्‍तीयन (ऋण सुविधा का पुनर्वित्‍तपोषण), जिसकी अवधि समग्र परिशोधन अवधि के भीतर प्रत्‍येक पुनर्वित्‍त के साथ तय की जा सकती है, की अनुमति दी जाएगी;

  3. इसका अर्थ यह होगा कि परियोजना की व्‍यवहार्यता का मूल्‍यांकन करते समय बैंक को व्यवहार्य परियोजना के रूप में परियोजना को स्‍वीकार करने की अनुमति दी जाएगी, जहां औसत कर्ज चुकौती कवरेज अनुपात (डीएससीआर) और अन्‍य वित्‍तीय और वित्‍तेतर मापदंड एक लंबी परिशोधन अवधि, जैसे 25 वर्ष (परिशोधन कार्यक्रम) के लिए स्‍वीकार्य होंगे, लेकिन निधीयन (प्रारंभिक ऋण सुविधा) केवल 5 वर्ष के लिए दी जाएगी और शेष ऋण के लिए विद्यमान या नए बैंकों द्वारा या बांडों के माध्‍यम से भी ऋण सुविधा के पुनर्वित्‍तपोषण की अनुमति दी जाएगी; तथा

  4. इनमें से प्रत्‍येक 5 वर्ष के बाद पुनर्वित्‍त (ऋण सुविधा का पुनर्वित्‍तीयन) मूल परिशोधन कार्यक्रम के अनुसार यथानिर्धारित कम राशियों का होगा।

5. इस पृष्‍ठभूमि में 10 जुलाई 2014 को प्रस्‍तुत संघीय बजट 2014-15 में माननीय वित्‍त मंत्री ने घोषित किया किः

“131.  बुनियादी संरचना क्षेत्र में अपेक्षाकृत बड़े निजी सेक्‍टर की बृहत्तर भागीदारी को प्रोत्‍साहन देने के मार्ग में इस क्षेत्र का दीर्घावधिक वित्‍तपोषण प्रमुख बाधा बना हुआ है। आस्ति पक्ष में, बैंकों को बुनियादी संरचना क्षेत्र के लिए दीर्घावधिक ऋण देने हेतु प्रोत्‍साहित किया जाएगा, जिसकी संरचना में लचीलापन होगा, जिससे संभावित प्रतिकूल आकस्मिकताओं को आत्‍मसात किया जा सके (जो कभी-कभी 5/25 संरचना के रूप में जाना जाता है)। देनदारी पक्ष में बैंकों को बुनियादी संरचना क्षेत्र को ऋण देने हेतु दीर्घावधिक निधि जुटाने की अनुमति दी जाएगी, जिन पर सीआरआर, एसएलआर और प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र (पीएसएल) जैसे विनियामक पूर्वक्रय कम से कम होंगे।"

6. भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा इन मुद्दों की जांच की गई। यह स्‍पष्‍ट किया जाता है कि पुनर्रचना1पर आस्ति वर्गीकरण के लिए विशेष विनियामक ट्रीटमेंट के मामलों को छोड़कर आरबीआई ने ऋणों की चुकौती अवधि के लिए कोई न्‍यूनतम या अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की है। अग्रिमों के संबंध में आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण और प्रावधानीकरण पर मास्‍टर परिपत्र के पैरा 1.3 में बैंकों द्वारा यह सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है कि ऋण और अग्रिम प्रदान करते समय उधारकर्ताओं के नकद प्रवाह के आधार पर व्‍यावहारिक चुकौती समय-सारणी निर्धारित की जाए, क्‍योंकि इससे उधारकर्ताओं को शीघ्र चुकौती करने में काफी सहायता मिलेगी और इस प्रकार अग्रिमों की वसूली के अभिलेख में सुधार होगा। साथ ही, 'आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण, प्रावधानीकरण तथा अन्य संबंधित मामले और पूंजी पर्याप्तता मानक – अंतरण वित्त (टेक आउट फाइनेंस)' के संबंध में 29 फरवरी 2000 के परिपत्र बैंपविवि. बीपी. बीसी. 144 /21.04.048-2000 के अनुसार बैंक किसी अन्य वित्तीय संस्था के साथ पूर्व निर्धारित आधार पर अंतरण वित्तपोषण करार करके अपने मौजूदा बुनियादी संरचना परियोजना ऋणों को पुनर्वित्त प्रदान कर सकते हैं। यदि कोई पूर्व निर्धारित करार न हो तो भी 'उधार खातों का एक बैंक से दूसरे बैंक में अंतरण' पर दिनांक 10 मई 2012 के हमारे परिपत्र बैपविवि.बीपी.बीसी.104/ 21.04.048 /2011-12 द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अधीन बैंक की बही में किसी मानक खाते को किसी अन्य बैंक/ वित्तीय संस्था द्वारा अधिगृहीत किया जा सकेगा।

7. साथ ही, 29 फरवरी 2000 के ऊपर उल्लिखित परिपत्र में आंशिक संशोधन करते हुए 'अर्थव्‍यवस्‍था में दबावग्रस्‍त आस्तियों को सशक्‍त करने के लिए ढांचा – परियोजना ऋणों को पुनर्वित्‍त प्रदान करना, एनपीए का विक्रय तथा अन्‍य विनियामक उपाय' पर 26 फरवरी 2014 के परिपत्र बैंपविवि.सं. बीपी. बीसी. 98/21.04.132/2013-14 के द्वारा बैंकों को सूचित किया गया था कि यदि वे, अन्‍य बैंकों/वित्‍तीय संस्‍थानों के साथ पूर्व-निर्धारित करार के बिना ही, किसी मौजूदा बुनियादी संरचना या किसी अन्‍य परियोजना ऋण को टेक-आउट वित्तपोषण के जरिए पुनर्वित्‍त प्रदान करते हैं तथा दीर्घतर चुकौती अवधि निर्धारित करते हैं तो उसे पुनर्रचना नहीं माना जाएगा, बशर्ते :

  1. ऐसे ऋण मौजूदा बैंकों की बहियों में 'मानक' होने चाहिए तथा अतीत में उनकी पुनर्रचना न हुई हो।

  2. ऐसे ऋण मुख्यतया (मूल्‍य के आधार पर बकाया ऋण के 50% से अधिक) मौजूदा वित्‍तपोषण करने वाले बैंकों/वित्‍तीय संस्‍थानों से अधिग्रहीत होने चाहिए।

  3. चुकौती की अवधि का निर्धारण परियोजना के जीवन चक्र और परियोजना से नकदी प्रवाह को ध्‍यान में रखते हुए किया जाना चाहिए।

8. उक्‍त को ध्‍यान में रखते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुदेश बैंकों द्वारा दीर्घावधि परियोजना वित्‍तीयन उत्‍पादों की संरचना के आड़े नहीं आते हैं, बशर्ते ऐसे उत्‍पादों की संरचना करते समय विवेकपूर्ण और विनियामक ढांचे का उचित रूप से पालन किया जाता है। तथापि, चूंकि बैंकों को कुछ आशंकाएं हैं, कि दीर्घावधि परियोजना ऋणों के इस प्रकार के पुनर्वित्‍त को पुनर्रचना माना जा सकता है, तथा प्रत्‍येक पुनर्वित्‍त अवधि की समाप्ति पर अनुमानित नकद प्रवाह (एकबारगी भुगतान के रूप में शेष ऋण) को एएलएम के प्रयोजन से उपयुक्‍त परिपक्‍वता अवधि में गिने जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी, इसलिए भारतीय रिज़र्व बैंक यह स्‍पष्‍ट करता है कि उसे बैंकों द्वारा बुनियादी संरचना और महत्‍वपूर्ण उद्योग क्षेत्र की दीर्घावधि परियोजनाओं के वित्‍तीयन पर, जैसाकि ऊपर पैरा 4 में सुझाया गया है, आपत्ति नहीं होगी, बशर्तेः

  1. केवल भारतीय रिज़र्व बैंक की बुनियादी संरचना क्षेत्र की सुसंगत मास्‍टर सूची के अंतर्गत परिभाषित बुनियादी संरचना परियोजनाएं तथा भारत सरकार, वाणिज्‍य और उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आठ महत्‍वपूर्ण उद्योगों (आधारः 2004-2005) की सूची में शामिल महत्‍वपूर्ण उद्योग क्षेत्र की परियोजनाओं (अर्थात् कोयला, कच्‍चा तेल, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम रिफाइनरी उत्‍पाद, उर्वरक, लौह (मिश्रधातु + अमिश्रधातु), सीमेंट तथा विद्युत – इनमें से कुछ क्षेत्र, जैसे उर्वरक, बिजली उत्‍पादन, वितरण और संचरण (ट्रंसमिशन) आदि बुनियादी संरचना उप-क्षेत्रों की सुसंगत मास्‍टर सूची में भी शामिल हैं) को प्रदत्‍त मीयादी ऋण ऐसे पुनर्वित्‍त के लिए पात्र होंगे;

  2. ऐसी परियोजनाओं के प्रारंभिक मूल्‍यांकन के समय यह सुनिश्चित करते हुए कि दबावपूर्ण परिदृश्‍यों में भी ऐसी परियोजनाओं के नकद प्रवाह और अन्‍य सभी आवश्‍यक वित्‍तीय और वित्‍तेतर मापदंड सुदृढ़ रहते हैं, बैंक एक परिशोधन कार्यक्रम (मूल परिशोधन कार्यक्रम) निर्धारित कर सकते हैं।

  3. सरकारी निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के अंतर्गत बुनियादी संरचना परियोजनाओं के मामले में परिशोधन सिड्यूल की अवधि प्रारंभिक रियायत अवधि के 80% (अंत का 20% छोड़कर) अथवा गैर-पीपीपी बुनियादी संरचना परियोजनाओं के मामले में उपभोक्‍ता प्रभार/शुल्‍क निर्धारित करने के लिए परियोजना मूल्‍यांकन करते समय कल्पित प्रारंभिक आर्थिक जीवनकाल का 80%, अथवा अन्‍य महत्‍वपूर्ण उद्योग परियोजनाओं के मामले में ऋणदाताओं के स्‍वतंत्र अभियंताओं द्वारा परियोजना मूल्‍यांकन के समय कल्पित प्रारंभिक आर्थिक जीवन काल का 80% से अधिक नहीं होनी चाहिए।

  4. प्रारंभिक ऋण सुविधा उपलब्‍ध कराने वाला बैंक मध्‍यम अवधि, जैसे 5 से 7 वर्ष के लिए ऋण मंजूर कर सकता है। इसमें प्रारंभिक निर्माण काल का ध्‍यान रखना चाहिए तथा कम से कम वाणिज्यिक परिचालन प्रारंभ करने की तारीख (डीसीसीओ) और राजस्‍व जुटाने तक की अवधि को भी शामिल करना चाहिए। इस अवधि के अंत में चुकौती (मूल परिशोधन कार्यक्रम के शेष अवशिष्‍ट भुगतान के बराबर वर्तमान मूल्‍य) की संरचना एकमुश्‍त भुगतान के रूप में की जा सकती है, जिसमें यह इरादा पहले से विनिर्दिष्‍ट किया गया हो कि इसे पुनर्वित्‍त किया जाएगा। यह चुकौती पुनर्वित्‍त ऋण सुविधा के रूप में उसी ऋणदाता अथवा नए ऋणदाताओं के समूह अथवा इन दोनों द्वारा संयुक्‍त रूप से अथवा कॉर्पोरेट बांड जारी करके की जा सकती है तथा परिशोधन अवधि के अंत तक ऐसे पुनर्वित्‍तीयन को दोहराया जा सकता है।

  5. प्रारंभिक ऋण सुविधा का चुकौती कार्यक्रम सामान्‍यतः मूल परिशोधन कार्यक्रम के अनुरूप होना चाहिए, बशर्ते डीसीसीओ की अवधि बढ़ाई न गई हो। ऐसे मामलों में ‘अग्रिमों के संबंध में आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण तथा प्रावधानीकरण’ पर दिनांक 01 जुलाई 2014 के हमारे मास्‍टर परिपत्र में निहित विद्यमान अनुदेशों के अनुसार यदि संशोधित डीसीसीओ की अवधि बुनियादी संरचना और गैर-बुनियादी संरचना के लिए मूल डीसीसीओ की तारीख से क्रमशः दो वर्ष और एक वर्ष के भीतर हो, तो केवल डीसीसीओ की अवधि बढ़ाने के बराबर या उससे कम अवधि का परिणामी परिवर्तन (संशोधित चुकौती अवधि की शुरुआती और अंतिम तारीख को शामिल करते हुए) भी पुनर्रचना नहीं माना जाएगा, बशर्ते ऋण की अन्‍य सभी शर्तें अपरिवर्तित हों अथवा विलंब की क्षतिपूर्ति के लिए उनमें बढ़ोतरी की गई हो, तथा संपूर्ण परियोजना ऋण परिशोधन को परियोजना के आरंभिक आर्थिक जीवनकाल के 85%2 के भीतर निर्धारित किया गया हो, जैसाकि ऊपर पैरा 8(iii) में निर्धारित किया गया है;

  6. परियोजना ऋण का परिशोधन कार्यक्रम ऋण की अवधि (डीसीसीओ के बाद) के दौरान एक बार संशोधित किया जा सकता है। यह संशोधन वित्‍तीय क्‍लोजर के दौरान लगाए गए अनुमानों की तुलना में परियोजना के वास्‍तविक कार्य-निष्‍पादन के आधार पर 'पुनर्रचना' न मानते हुए किया जाएगा, बशर्ते:

    क) परिशोधन कार्यक्रम में परिवर्तन की तारीख को ऋण मानक ऋण होना चाहिए।

    ख) परिशोधन कार्यक्रम में परिवर्तन से पहले और बाद में ऋण का निवल वर्तमान मूल्‍य समान रहता है।

    ग) संपूर्ण परियोजना ऋण परिशोधन को परियोजना के आर्थिक जीवन काल के 85%3 के भीतर निर्धारित किया जाता है, जैसाकि ऊपर पैरा 8(iii) में बताया गया है।

  1. यदि प्रारंभिक ऋण सुविधा या पुनर्वित्‍त सुविधा किसी भी स्‍तर पर एनपीए बन जाती है, तो आगे पुनर्वित्‍त रोक देना चाहिए तथा जब यह एनपीए होता है, तब जो बैंक ऋण धारण करता है, उससे अपेक्षित है कि वह ऋण को एनपीए माने तथा विद्यमान विनियमों के अंतर्गत अपेक्षित आवश्‍यक प्रावधान करे। जब खाता एनपीए स्थिति से बाहर आ जाएगा, तब वह इन अनुदेशों के अनुसार पुनिर्वत्‍त के लिए पात्र होगा;

  2. बैंक प्रारंभिक ऋण सुविधा या पुनर्वित्‍त ऋण सुविधा की मंजूरी के प्रत्‍येक स्‍तर पर ऋण के प्रत्‍येक चरण की जोखिम के अनुरूप ऋण का मूल्‍य-निर्धारण (ब्‍याज निर्धारण) कर सकते हैं तथा ऐसा मूल्‍य बैंक की आधार दर से नीचे नहीं होना चाहिए;

  3. बैंकों को उचित प्रलेखीकरण और प्रतिभूति निर्माण आदि के द्वारा अपने हित की रक्षा करनी चाहिए;

  4. बैंकों को अपने आस्ति-देयता प्रबंधन के लिए प्रारंभ में ऋणों के आवधिक परिशोधन तथा प्रत्‍येक पुनर्वित्‍त अवधि के अंत में बकाया ऋण के एकमुश्‍त भुगतान से नकद प्रवाह की गणना करने की अनुमति दी जाएगी; तथापि प्राप्‍त अनुभव के आधार पर बैंकों से अपेक्षित होगा कि वे यथासमय ऐसे ऋणों के परिशोधन के नकद प्रवाहों का व्‍यवहारवादी अध्‍ययन करें और तदनुसार उन्‍हें अपने एएलएम विवरण में रखें;

  5. जोखिम प्रबंधन की दृष्टि से बैंकों को यह मानना चाहिए कि अन्‍य बैंकों द्वारा ऋण को पुनर्वित्‍त नहीं करने की संभावना हो सकती है तथा चलनिधि आवश्‍यकताओं का अनुमान लगाते समय, तथा दबाव परिदृश्‍यों के लिए इसे ध्‍यान में रखना चाहिए। इसके अलावा, जब तक अन्‍य बैंकों द्वारा आंशिक या पूर्ण पुनर्वित्‍तीयन का स्‍पष्‍ट निर्धारण नहीं हो जाता, ऐसे पुनर्वित्‍त के नकद प्रवाहों को चलनिधि अनुपात की गणना के लिए हिसाब में नहीं लिया जाना चाहिए। इसी प्रकार, एक बार प्रतिबद्ध होने के बाद पुनर्वित्‍त प्रदान करने वाले बैंक को भी अपने चलनिधि अनुपातों की गणना करते समय ऐसे नकद प्रवाह को हिसाब में लेना चाहिए; तथा

  6. बैंक के पास ऐसे वित्‍तीयन के लिए बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति होनी चाहिए।

9. उपर्युक्‍त संरचना इस परिपत्र की तारीख के बाद बुनियादी संरचना परियोजनाओं और महत्‍वपूर्ण उद्योग परियोजनाओं को मंजूर किए गए नए ऋणों पर लागू होगा। इसके अलावा इन अनुदेशों के अंतर्गत बुनियादी संरचना और महत्‍वपूर्ण उद्योग परियोजनाओं को मंजूर किए गए किसी भी ऋण पर 'टेक-आउट वित्‍त' (दिनांक 29 फरवरी 2000 का परिपत्र) तथा 'उधार खातों का अंतरण' (दिनांक 10 मई 2012 का परिपत्र) पर हमारे अनुदेश अब लागू नहीं होंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक आवधिक अंतराल पर इन अनुदेशों की समीक्षा करेगा।

भवदीय

(सुदर्शन सेन)
प्रभारी मुख्‍य महाप्रबंधक


1 दिनांक 01 जुलाई 2014 के मास्‍टर परिपत्र – ‘अग्रिमों के संबंध में आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण तथा प्रावधानीकरण' के भाग ख का पैरा 15.2.2।

2 पैरा 8(iii) में निर्धारित परियोजना ऋणों के परिशोधन की 80% अधिकतम सीमा में डीसीसीओ हासिल करने में विलंब के मामले में प्रारंभिक जीवनकाल के केवल 5% की छूट दी जा सकती है। मूल परिशोधन अवधि निर्धारित करते समय बैंक इस तथ्‍य पर ध्‍यान दें।

3 कृपया ऊपर फुटनोट सं. 2 देखें।

RbiTtsCommonUtility

प्ले हो रहा है
सुनें

संबंधित एसेट

आरबीआई-इंस्टॉल-आरबीआई-सामग्री-वैश्विक

RbiSocialMediaUtility

आरबीआई मोबाइल एप्लीकेशन इंस्टॉल करें और लेटेस्ट न्यूज़ का तुरंत एक्सेस पाएं!

हमारा ऐप इंस्टॉल करने के लिए QR कोड स्कैन करें

RbiWasItHelpfulUtility

पृष्ठ अंतिम बार अपडेट किया गया:

क्या यह पेज उपयोगी था?