रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने वर्ष 2004-05 के लिए वार्षिक नीति वक्तव्य की मध्यावधि समीक्षा घोषित की
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26 अक्तूबर 2004
रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने वर्ष 2004-05 के लिए वार्षिक नीति वक्तव्य की मध्यावधि समीक्षा घोषित की खास-खास बातें
वक्तव्य में रूपरेखा और विषयवस्तु, दोनों ही के लिए पिछले वर्षों के दौरान पहले से निर्धारित परिपाटी को अपनाया गया है। घरेलू गतिविधियां
बाहरी गतिविधियां
समग्र आकलन
मौद्रिक नीति की अवस्थिति
वित्तीय क्षेत्र सुधार तथा मौद्रिक नीति उपाय
सूरज प्रकाश प्रबंधक
26 अक्तूबर 2004 रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने वर्ष 2004-05 के लिए वार्षिक नीति वक्तव्य की मध्यावधि समीक्षा घोषित की
डॉ. वाइ.वेणुगोपाल रेड्डी, गवर्नर ने प्रमुख वाणिज्य बैंकों के मुख्य कार्यपालकों की बैठक में आज वर्ष 2004-05 के लिए वार्षिक नीति वक्तव्य की मध्यावधि समीक्षा प्रस्तुत की। प्रारंभ में, गवर्नर महोदय ने स्पष्ट किया कि नीति दस्तावेजों का उद्देश्य, रिज़र्व बैंक द्वारा समय समय पर शुरू किये गये मौद्रिक, संरचनात्मक और विवेकपूर्ण उपायों के तर्काधार का समझना है। इस प्रक्रिया में, बेहतर पारदर्शिता और बेहतर संप्रेषण का नज़रिया नीति निर्माण में प्रभावी परामर्श की भूमिका निभाता है। गवर्नर महोदय ने उल्लेख किया कि इस वक्तव्य में पिछले वर्षों में पहले से स्थापित परिपाटी को अपनाया है। घरेलू गतिविधियां वर्ष 2004-05 में सकल घरेलू उत्पाद में वफ्द्धि 36 मैट्रॉलॉजिकल सब डिवीजन में से 13 के अपूर्ण मानसून तथा खरीप उत्पाद पर उसके संभावित प्रभाव, सकल घरेलू उत्पाद में वफ्द्धि पर उच्चतर तेल मूल्यों के कारण होने वाले प्रतिकूल प्रभाव के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्र में वफ्द्धि की बेहतर संभावना और निर्यातों में जारी उछाल को देखते हुए यह मानना उचित ही होगा कि वर्ष 2004-05 के लिए समग्र सकल घरेलू उत्पाद वफ्द्धि पहले की 6.5-7.0 प्रतिशत अपेक्षा के मुकाबले 6.0-6.5 प्रतिशत की सीमा में रहेगी, यह अपेक्षा करते हुए कि उच्च और अनिश्चित तेल मूल्य का संयुक्त अधोमुखी जोखिम और अंतर्राष्ट्रीय चलनिधि परिवेश के आकस्मिक परिवर्तन ऐसे बने रहेंगे जिन्हें काबू में लाया जा सके। गैर-खाद्यान्न ऋण गवर्नर महोदय ने गैर-खाद्यान्न ऋण में पिछले वर्ष की तदनुरूपी अवधि की 6.0 प्रतिशत (41,034 करोड़ रुपये) की वफ्द्धि की तुलना में पहली अक्तूबर 2004 तक गैर-खाद्यान्न ऋण में 11.5 प्रतिशत (92,443 करोड़ रुपये) की शानदार वफ्द्धि का उल्लेख किया। बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से वाणिज्यिक क्षेत्र को संसाधन की उपलब्धता पिछले वर्ष की तदनुरूपी अवधि की 66,863 करोड़ रुपये की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 1,08,510 करोड़ रुपये हुई। ऋण के क्षेत्रीय वितरण की विस्तफ्त जानकारी यह दर्शाती है कि ऋण प्रवाह की दो-तिहाई से अधिक की राशि खुदरा, आवास और अन्य प्राथमिकता क्षेत्र के ऋणों के कारण हुई है। साथ ही औद्योगिक ऋण में वफ्द्धि पेट्रोलियम, बुनियादी तत्व विद्युत, निर्माण, धातु और धातु के उत्पाद, ड्रग, पार्मास्युटिकल्स, रत्न और जवाहरात और ऑटोमोबाइल उद्योगों के कारण हुई है। मौद्रिक संकेतक मौद्रिक संकेतकों का उल्लेख करते हुए गवर्नर महोदय ने कहा कि चालू वित्तीय वर्ष में (पहली अक्तूबर 2004 तक) मुद्रा आपूर्ति में पिछले वर्ष की 7.8 प्रतिशत की तुलना में 5.4 प्रतिशत वफ्द्धि हुई। उन्होंने कहा कि वार्षिक आधार पर एम3 में 14.0 प्रतिशत की जो वफ्द्धि हुई वह पिछले वर्ष की तुलना में अलबत्ता 11.9 प्रतिशत से अधिक थी। वाणिज्यिक बैंकों की कुल जमाराशियों ने निम्नतर वफ्द्धि दर्ज की। इसका कारण बैंकिंग प्रणाली के साथ, मुख्य रूप से अनिवासी भारतीयों द्वारा कम जमाराशियां भेजना रहा। प्रारक्षित मुद्रा में पिछले वर्ष की तदनुरूपी अवधि में 0.9 प्रतिशत की वफ्द्धि की तुलना में, चालू वित्तीय वर्ष में 15 अक्तूबर 2004 तक में 0.6 प्रतिशत की वफ्द्धि हुई। मुद्रास्पीति दर वार्षिक मुद्रास्पीति, थोक मूल्य सूचकांक में उतार-चढ़ाव द्वारा मापे गये रूप में बिंदु-दर-बिंदु आधार पर मार्च अंत के 4.6 प्रतिशत से बढ़कर 9 अक्तूबर 2004 तक 7.1 प्रतिशत हो गयी। औसत आधार पर, थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित वार्षिक मुद्रास्पीति एक वर्ष पहले के 4.9 प्रतिशत की तुलना में 9 अक्तूबर 2004 तक 6.2 प्रतिशत रही। गवर्नर महोदय ने स्पष्ट किया कि चार मदों, अर्थात् लौह अयस्क, लोहा और इस्पात, खनिज तेल और कोयला खनन को छोड़कर, जिन्होंने सापेक्षत: उच्च मुद्रास्पीति दर दर्ज की है, बिंदु दर-बिंदु आधार पर थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्पीति दर पिछले वर्ष की 3.8 प्रतिशत की तुलना में 1 अक्तूबर 2004 को 4.2 प्रतिशत दर्ज की गयी। गवर्नर महोदय ने स्पष्ट किया कि उच्चतर अंतर्राष्ट्रीय तेल मूल्यों के प्रभाव को अब तक राजकोषीय उपाय, जैसे उत्पाद और सीमा शुल्क में कटौती के कारण आंशिक रूप से सहारा मिलता रहा। चालू मूल्यांकन के बाद, यह मानते हुए कि आगे कोई मुख्य आपूर्ति संबंधी झटका नहीं होगा और चलनिधि स्थितियां नियंत्रण में रहेंगी, गवर्नर महोदय ने यह अपेक्षा व्यक्त की कि वर्ष 2004-05 के लिए थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित बिंदु दर बिंदु वर्ष के अंत की मुद्रास्पीति पहले अनुमानित 5.0 प्रतिशत के बजाय करीबन 6.5 प्रतिशत तक मानी जा सकती है। अलबत्ता, गवर्नर महोदय ने यह कहा कि हाल ही की अवधि में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्पीति थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्पीति से निम्नतर रही है, जो कवरेज और खाद्यान्नों के कीमतों में निम्नतर वफ्द्धि के अंतर को प्रतिबिंबित करती है। उन्होंने यह पाया कि यूरो क्षेत्र के देशों को छोड़कर अधिकांश देशों में उत्पादक मूल्य सूचकांकों और उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों के बीच इसी तरह की विसंगति देखी गयी है। सरकारी उधार केंद्र सरकार ने 21 अक्तूबर 2004 तक 26,233 करोड़ रुपये के शुद्ध बाजार उधार (बजट की गयी राशि का 29.0 प्रतिशत) और 75,044 करोड़ रुपये (बजट की गयी राशि का 49.8 प्रतिशत) के कुल बाजार उधार पूरे किये हैं। इस वर्ष अब तक (21 अक्तूबर 2004 तक) दिनांकित प्रतिभूतियों के माध्यम से सरकारी उधारों पर भारित औसत प्रतिपल 5.76 प्रतिशत रहा जो पिछले वर्ष के 6.90 प्रतिशत से कम रहा है। इस वर्ष तक सरकारी उधारों की कम लागत पहली छमाही उधारों की हमेशा की मात्रा से कम आँकी जा सकती है, जिसका कारण मार्च 2004 के अंत के 26,669 करोड़ रुपये के बकाया नकदी अधिशेष को इस वर्ष में आगे लाया जाना और बैंकों के पारंपरिक स्रोत को छोड़कर बाजार सहभागियों से इकठ्ठा हुए आनुपातिक रूप से उच्चतर अंशदान है। इस वर्ष की दूसरी छमाही के लिए लिये गये सामान्य से अधिक उधार को ध्यान में रखते हुए बाकी वर्ष में मजबूत ऋण मांग को देशते हुए बाजार उधार कार्यक्रम का सावधानी पूर्वक तैयार करने की ज़रूरत है। अत: यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण होगा कि राजकोषीय घाटे में कोई चूक न हो। गवर्नर महोदय ने केंद्र और राज्य सरकारों के बड़े पैमाने पर कुल उधारों की अवस्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए पांच राज्यों द्वारा राजकोषीय जिम्मेदारी कानून बनाने पर सकारात्मक गतिविधियां और 5 जुलाई 2004 से राजकोषीय समेकन के लिए केंद्र द्वारा राजकोषीय जिममेदारी और बजट प्रबंधन नियमावली बनायी जाने पर संकेत दिया। बैंकों के निवेश अनुसूचित वाणिज्य बैंकों के एसएलआर प्रतिभूतियों में 2,67,328 करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश ने निवल मांग और मीयादी देयताओं का 16.3 प्रतिशत का हिस्सा बनाया। अलबत्ता, चालू वर्ष के दौरान, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में 27,435 करोड़ रुपये के निवेश (पहली अक्तूबर 2004 तक) पिछले वर्ष की तदनुरूपी अवधि के 76,705 करोड़ रुपये से कमतर रहे, जिसका कारण ऋण मांग में आंशिक रूप से उछाल रहा। पिर भी, 39.7 प्रतिशत के प्रभावी एसएलआर निवेश के साथ अपेक्षित ऋण उछाल के सामने एसएलआर प्रतिभूतियों की कम मांग के कारण बाज़ार निर्धारित ब्याज दरों के परिवेश में बाजार उधारों पर प्रभाव पड़ा। बाजार स्थिरीकरण योजना वर्ष 2004-2005 के दौरान 21 अक्तूबर 2004 तक बाजार स्थिरीकरण योजना के माध्यम से चलनिधि खपत 54,146 करोड़ रुपये रही। बाजार स्थिरीकरण योजना जारी करने के साथ, चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत रेपो की मात्रा अप्रैल के 70,523 करोड़ रुपये औसत से घट कर अक्तूबर 2004 में (21 अक्तूबर तक) 13,805 करोड़ रुपये रह गयी। चलनिधि जो स्थिर बनी रही थी, अप्रैल के करीब 81,260 करोड़ रुपये औसत से घट कर अक्तूबर में (21 अक्तूबर तक) 67,321 करोड़ रुपये रह गयी। बाजार स्थिरीकरण योजना और रेपो के अलावा रिज़र्व बैंक के पास केंद्र सरकार के खाते के अधिशेष बकाया ने समय समय पर अतिरिक्त चलनिधि को निष्क्रिय बनाने में सहायता की। वर्ष के दौरान अतिरिक्त चलनिधि में कुछ गिरावट के होते हुए भी चलनिधि का निकास (ओवरहैंग) उल्लेखनीय रहा। ब्याज दर गवर्नर महोदय ने पाया कि वित्तीय बाजार सामान्यत: स्थिर रहे हैं हालांकि ब्याज दरों ने कुछ उर्ध्वमुखी, खास तौर पर दीर्घावधि में गतिविधि दर्शायी। उन्होंने सूचित किया कि वाणिज्यिक बैंकों ने भारतीय बैंक संघ द्वारा सूचित किये अनुसार अपनी आधार चिह्न मूल उधार दरें (बेंचमार्क प्राइम लैंडिंग रेट) घोषित की हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जून 2004 में सरकारी क्षेत्र के बैंकों के मांग और मीयादी ऋणों (जिस पर अधिकतम कारोबार का करार किया जाता है) पर प्रतिनिधिक (मध्य) उधार दरें 10.50 - 12.75 प्रतिशत थीं। निवेश उतार-चढ़ाव आरक्षित निधि सफ्जित करने की आवश्यकता जारी रखने पर बल देते हुए बैंकों के निवेश संविभाग पर मौजूदा दिशानिर्देशों की समीक्षा होने तक के समय के लिए, गवर्नर महोदय ने स्पष्ट किया कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों को एचटीएम श्रेणी के अंतर्गत समाविष्ट निवेशों के 25 प्रतिशत की उच्चतम सीमा तक, उनके एसएलआर प्रतिभूतियों के कुछ निवेशों को एचएपटी/एएपएस श्रेणी से एचटीएम श्रेणी में अंतरित करके अर्जन के न्यूनतम लागत पर या प्रचलित बाजार दर या बही मूल्य पर बढ़ाने की अनुमति दी है, बशर्ते एसएलआर प्रतिभूतियों की अधिकतम 25 प्रतिशत राशि एचटीएम में रखी जानी होंगी। गवर्नर महोदय ने संकेत दिया कि बैंकों को सूचित किया गया कि वे मार्च 2006 के अंत तक बासले घ्घ् मानदंडों के अंतर्गत सोचे गये अनुसार चरणबद्ध तरीके में बाजार जोखिम के लिए पूंजी प्रभार को लागू करने के लिए स्वयं को तैयार रखें। बाहरी गतिविधियां वैश्विक अर्थव्यवस्था स्ंभावना गवर्नर महोदय ने संकेत दिया कि हालांकि वैश्विक सुधार में मजबूती आ रही है, कुछ जोखिम बढ़े हैं, खास तौर पर, वैश्विक तेल मूल्यों में वफ्द्धि के लगातार बने रहने के कारण, जोकि भारत जैसे देश में जहां तेल आधारित उद्योग बढ़ रहे हैं और ऊर्जा क्षमता कम है, उभरते हुए तेल आयातक देश के लिए अनुपातिक रूप से काफी बड़ा बोझ था। इन परिस्थितियों में और लगातार वफ्द्धि के बने रहने के कारण कुछ केंद्रीय बैंकों ने अपनी नीति दरें बढ़ायीं, जबकि कुछ अन्य केंद्रीय बैंकों ने अपनी दरें घटायीं। अत:, समग्र रूप से किसी देश/क्षेत्र की विशिष्ट ब्याज दर अवस्थिति का विकल्प उसके स्वयं के देशी आर्थिक विचारों के मार्गदर्शन पर अधिकांश रूप से निर्भर प्रतीत होता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने खड़ा अन्य प्रमुख अधोमुखी जोखिम, वैश्विक असन्तुलनों और संबद्ध विघटनकारी मुद्रा समायोजनों और यूरो क्षेत्र और जापान की निरन्तर संरचनात्मक समस्याओं को कारण रही। विदेशी मुद्रा बाज़ार स्थिर बना रहा भारतीय विदेशी मुद्रा बाज़ार ने आमतौर पर चालू वित्तीय वर्ष में अब तक (अप्रैल-अक्तूबर 2004) व्यवस्थित स्थितियां दर्शायीं। रुपये की विनिमय दर जोकि मार्च 2004 के अंत में 43.39 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर थी, 21 अक्तूबर 2004 तक 5.2 प्रतिशत की गिरावट दर्शाते हुए 45.77 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर रह गयी। इसमें, इसी अवधि के दौरान यूरो की तुलना में 7.9 प्रतिशत, पाउंड स्टर्लिंग की तुलना में 4.3 प्रतिशत तथा जापानी येन की तुलना में 1.9 प्रतिशत की गिरावट आयी। मुद्रा भंडार बढ़े विदेशी मुद्रा भंडारों में मार्च 2004 के अंत के 113.0 बिलियन अमेरिकी डॉलर में 7.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर वफ्द्धि हुई और वे 21 अक्तूबर 2004 को 120.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गये। गवर्नर महोदय ने संकेत दिया कि हाल ही के वर्षों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडारों के प्रबंधन के लिए समग्र नज़रिये से भुगतान संतुलन की बदलती हुई संरचना का पता चलता है और इसमें आनेवाली राशियों और अन्य अपेक्षाओं के साथ जुड़े अलग-अलग प्रकार के चलनिधि जोखिमों को दर्शाने का प्रयास किया गया है। इन घटकों को हिसाब में लेते हुए भारत के विदेशी मुद्रा भंडार वर्तमान में ठीक-ठाक और वफ्द्धि दर, अर्थव्यवस्था में बाहरी क्षेत्र के हिस्से तथा जोखिम समायोजित पूंजी आगमनों के आकार के अनुरूप प्रतीत होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय ढांचे द्वारा उपलब्ध करायी गयी सहज स्थिति के स्तर को देखते हुए पूंजीगत आगमनों में उतार-चढ़ावों के विरुद्ध बीमे के रूप में भंडारों पर विचार करने के अलावा इस बात की ज़रूरत है कि वास्तविक क्षेत्र में अनिश्चित मानसून स्थितियों, बाह्य क्षेत्र में वैश्विक तेल मूल्यों में उतार-चढ़ावों तथा राजकोषीय परिदृश्य में लोक ऋण के ऊंचे स्तरों के खिलाप गुंजाइश रखी जाए। बाह्य क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय तुलन-पत्र नज़रिया अपनाने के तथा निजी क्षेत्र की वजह से बढ़ती हुई बाह्य देयताओं के उत्तर में सरकारी भंडारों के ज़रिए गुंजाइश रखने के कापी पायदे हैं। इसके अलावा, पूंजीगत आगमनों में उतार-चढ़ावों के संदर्भ में भंडारों के स्तर द्वारा निवेशकों को उपलब्ध करायी गयी सहज स्थिति तथा विश्वास को स्वीकार करना भी उपयोगी होगा। विनिमय दर समायोजन के लिए ज़रूरत पर मीडिया में हाल ही में चल रही बहस का उल्लेख करते हुए गवर्नर महोदय ने स्पष्ट किया कि आनेवाली राशियों की अस्थायी अथवा स्थायी प्रवफ्ति का निर्धारण करने में प्राधिकारियों के सामने आ रही अनिश्चितता के दृश्यपटल को देखते हुए यह मान लेना विवेकपूर्ण होगा कि इस तरह के प्रवाह तब तक के लिए अस्थायी हैं जब तक वे स्थायी प्रवफ्ति के रूप में मज़बूती से स्थापित नहीं हो जाते। भुगतान संतुलन भारत के निर्यातों में अप्रैल-सितंबर 2004 के दौरान अमेरिकी डॉलर के रूप में 24.4 प्रतिशत की वफ्द्धि हुई जबकि पिछले वर्ष की तदनुरूपी अवधि के दौरान 8.1 प्रतिशत की वफ्द्धि हुई थी। पिछले वर्ष की तदनुरूपी अवधि की 21.0 प्रतिशत की वफ्द्धि की तुलना में आयात 34.3 प्रतिशत बढ़े। तेल आयातों में 6.4 प्रतिशत की तुलना में 57.8 प्रतिशत की वफ्द्धि हुई जबकि गैर-तेल आयातों में 27.4 प्रतिशत की तुलना में 25.8 प्रतिशत की वफ्द्धि हुई। समग्र व्यापार घाटा पिछले वर्ष की तदनुरूपी अवधि के 7.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की तुलना में बढ़ कर 12.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। इस वर्ष उच्चतर व्यापार घाटे का बहुत बड़ा हिस्सा अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों में कड़ेपन को देखते हुए ऊंचे तेल आयात बिल और आर्थिक गतिविधियों में उछाल से होनेवाली आयात मांग में वफ्द्धि से हुआ। इसे उच्चतर पूंजी माल आयातों से देखा जा सकता है। गवर्नर महोदय ने उल्लेख किया कि भुगतान संतुलन का मौजूदा खाता पिछले तीन वर्षों के दौरान लगातार अधिशेष का रहा है। 2004-05 की पहली तिमाही के दौरान 1.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर का चालू खाता अधिशेष दर्ज़ किया गया। मूल्यन प्रभाव को छोड़ कर विदेशी मुद्रा भंडार में अप्रैल-जून 2004 के दौरान कुल 7.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर की शुद्ध राशियां जुड़ीं। अलबत्ता, 2004-05 की दूसरी तिमाही के दौरान इस बात के संकेत हैं कि आयातों में लगातार ऊपर बढ़ती हुई स्थिति से चालू खाते में केवल मामूली सा अधिशेष होगा। इसके पिछले यह भी संभावना काम करेगी कि व्यापारिक निर्यातों तथा परोक्ष अर्जनों में आशातीत वफ्द्धि जारी रहेगी। निवल पूंजीगत आगम राशियां पहली तिमाही में दर्ज़ स्तर से थोड़ा कम हुई हैं। हालांकि वैश्विक भू-राजनैतिक अनिश्चितताओं को देखते हुए पूंजी प्रवाहों के व्यवहार का अंदाजा लगाना मुश्किल है, भारत की सकारात्मक सोच सतत उछाल के लिए पूरी तरह तैयार होनी चाहिए लेकिन वैश्विक ब्याज दर चक्र के पलटने को देखते हुए उसमें मंदी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। समग्र आकलन गवर्नर महोदय ने पाया कि वर्ष के दौरान एक उल्लेखनीय गतिविधि यह रही है कि पहली छमाही में, जो कि ऋण उठाने के लिए परांपरागत रूप में मंदी का मौसम माना जाता है, गैर खाद्यान्न ऋण में उछाल आया है। चालू वर्ष में अब तक की गतिविधियों की समीक्षा करने से इस बात पुष्टि होती है कि निवेश गतिविधि पिर से सक्रिय हो रही है। उन्होंने महसूस किया कि विनिर्माण उद्योग बहुत तेज़ वफ्द्धि के संकेत दे रहा है। इससे अतीत की तुलना में ऋण ज़रूरतों में उच्चतर वफ्द्धि देखने को मिलेगी। मौजूदा नीतिगत प्राथमिकताओं के परिणामस्वरूप, वफ्षि को ऋण भी अपने निम्नतम बिंदु से ऊपर उठ रहा है और यह गैर-संस्थागत उधारदाताओं को हटाकर व्यापक ऋण दखल भी शुरू कर सकता है। तेजी से बढ़ते हुए आवास और उपभोक्ता ऋण क्षेत्र भी कुछ मात्रा तक उच्चतर पहुंच दिखा रहे हैं लेकिन ऋण देने की गुणवत्ता पर ध्यान दिये जाने की ज़रूरत होगी। कुल मिला कर, निवेश गतिविधियों में उछाल तथा गैर-खाद्यान्न ऋण में वफ्द्धि, मज़बूती से जमे दिखायी देते हैं और इन्हें अस्थायी घटना नहीं माना जा सकता। इन अनुकूल परिणामों से चलनिधि परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने तथा अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों को ऋण सुपुर्दगी में सतत ज़ोर दिये जाने की ज़रूरत का पता चलता है। गवर्नर महोदय ने उल्लेख किया कि वैश्विक प्रतिस्पर्धी दबावों के बीच निर्माण उद्योग में बढ़ी हुई वफ्द्धि की शुरुआत एक सकारात्मक गतिविधि है और इसकी गति बनाये रखने के लिए नीतिगत समर्थन की ज़रूरत होगी। गवर्नर महोदय ने उल्लेख किया कि वैश्विक गतिविधियों से खास तौर पर तेल तथा लोहे और इस्पात जैसी अन्य कुछ प्रमुख वस्तुओं की वजह से सामने आनेवाले आपूर्ति झटके की उम्मीद की जा रही थी लेकिन इसकी मात्रा तथा निरंतर बने रहने की उम्मीद नहीं की गयी थी। तेल मूल्यों में वफ्द्धि का पूरा असर अभी भी घरेलू मूल्यों में खपाया जाना बाकी है, आपूर्ति घटक मूल्य स्थिति पर हावी बने रहेंगे जबकि मांग प्रबंधन की तरप पहले की तुलना में खास तौर पर विश्वसनीय तरीके से, मुद्रास्पीतिकारी अपेक्षाओं को स्थिर बनाये रखने के लिए ध्यान दिये जाने की ज़रूरत होगी। गवर्नर महोदय ने संकेत दिया कि वित्तीय बाज़ार के विभिन्न घटकों ने कमोबेश स्थिरता दर्शायी है। सरकारी प्रतिभूति बाज़ार ने थोड़ी सी उत्तेजना और साथ ही साथ मंदी की प्रवफ्त्ति दिखायी। इसका श्रेय आपस में जुड़े मुद्दों को दिया जा सकता है, उदाहरण के लिए (क) बाज़ार को अत्यधिक आशावाद से धरती पर लाने की ज़रूरत थी, (ख) मुद्रास्पीति में अप्रत्याशित उछाल आया, (ग) गैर-खाद्यान्न ऋण में तीव्र वफ्द्धि में भी उम्मीदों पर कुछ दबाव डाला, और (घ) हाल ही के महीनों में वैश्विक परिवेश ब्याज दरों को कड़ा बनाने की तरप मुड़ा है। वार्षिक नीति वक्तव्य में इन मुद्दों पर रिज़र्व बैंक द्वारा ध्यान दिलाये जाने के बावजूद यह देखा गया कि कुछ बाज़ार सहभागी परिस्थितियों के सामने आने के साथ साथ पूरी तरह से तैयार नहीं थे। इस संदर्भ में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हालांकि रिज़र्व बैंक स्थिरता के विचार को कुछ वज़न देना जारी रखेगा, बाज़ार को चाहिए कि वह अनिश्चितताओं के लिए तैयार रहें। गवर्नर महोदय ने संकेत दिया कि बेहतरीन समयों में मौद्रिक नीति का संचालन जटिल काम होता है क्योंकि इसे सामने भी निगाह रखनी होती है और तेजी से हो रहे परिवर्तनों के सापेक्ष कई बार चालू तथा पुराने पड़ चुके आंकड़ों पर इसे आधारित रहना होता है। उभरते हुए बाज़ार के मामले में अतिरिक्त जटिलताएं आ जुड़ती हैं जोकि एक बंद अर्थव्यवस्था से धीरे धीरे खुली अर्थव्यवस्था की ओर जाने का संकेत होता है। मौजूदा में जिन घटकों की वजह से मौद्रिक प्रबंधन जटिल होता जाता है उनमें निम्नलिखित शामिल हैं : वैश्विक रूप से सामने आने वाला आपूर्ति झटका; सामान्य की तुलना में कम मानसून स्थिति; चलनिधि ओवरहैंग का बना रहना; और गैर-खाद्यान्न ऋण चिरप्रतीक्षित उछाल। यह नीति विश्लेषणों तथा कुछ निर्णयों के आधार पर सामने आनेवाली परिस्थितियों के अनुरूप कार्य करती रही है। पहली बात, नवंबर 2003 में ब्याज दर तंत्र में नरमी के रुख की और आगे बढ़ने की व्यापक उम्मीदे थीं जबकि यह माना जा रहा था कि ब्याज दर चक्र अपने सबसे नीचे के स्तर तक जा पहुंचा है। दूसरी बात, चालू कैलेंडर वर्ष के शुरुआती हिस्से में पूंजी प्रवाहों पर इस बात का निर्णय लिया जाना था कि पूंजी आगमनों के कौन से हिस्से को अस्थायी के रूप में माना जाए। इस संबंध में उन्होंने इस तथ्य का उल्लेख किया कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार, विदेशी मुद्रा भंडारों में वफ्द्धि की उसी मात्रा के लिए अलग-अलग तरीके से रिएक्ट (सकारात्मक) करते हैं तथा विदेशी मुद्रा भंडारों में गिरावट (बहुत नकारात्मक) को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। तीसरी बात, अनुभवजन्य प्रमाण यह बताते हैं कि सरकार में राजनैतिक कार्यपालकों में परिवर्तन के संदर्भ में वित्तीय बाज़ारों की संकल्पना को गतिविधियों की निगरानी करते समय अनदेखा नहीं किया जा सकता। चौथी बात, जब कुछ केंद्रीय बैंक आसान से और अधिक निरपेक्ष नीति की तरप मुड़ते हैं और नीति ब्याज दरें बढ़ा देते हैं तो इसका भारतीय वित्तीय बाज़ारों पर अनिवार्य रूप से असर होता ही है। इन गतिविधियों के उत्तर में लगातार आधार पर इस बात के निर्णय लिये जाने होते हैं कि नज़रिये में बदलाव लाये बिना संभावित लागतों के संबंध में वित्तीय बाज़ारों में स्थिरता को कितना वज़न दिया जाए। पांचवीं बात, तीव्र तेल झटके के सामने आने पर, जोकि अर्धखुली अर्थव्यवस्था में उदारीवफ्कत बाज़ार उन्मुखी परिवेश में अपनी तरह का पहला था, निर्णय लेने के पीछे प्रमुख विचार यह था कि रिज़र्व बैंक के संप्रेषण तथा नीतिगत प्रतिक्रियाओं को तदनुरूपी राजकोषीय तथा निगम शुरुआतों के साथ सौहार्दपूर्ण बनाया जाए। इस तरह से वर्ष की पहली छमाही में नीति के संचालन की विशेषता यह रही कि यह सतत आधार पर तथा नपे-तुले आधार पर गतिविधियों की प्रतिक्रिया वे रूप में था और इसमें संदर्भ के अनुसार वैश्विक तथा घरेलू घटकों को, वफ्द्धि तथा मूल्य स्थिरता को कुशलता तथा वित्तीय स्थिरता को, और सबसे बड़ी बात आम आदमी की चिंताओं को सामने रख कर तैयार की गयी थी। परिचालनगत रूप से यह उम्मीद की जाती है कि वर्ष के बाकी हिस्से के लिए चुनौतियां कमोबेश वैसी ही बनी रहेंगी अर्थात् चलनिधि का प्रबंधन ओवरहैंग के अनुरूप तथा उसे बाहर निकालते हुए, सरकार के उधार कार्यक्रम की प्रगति सामने आनेवाली घरेलू तथा वैश्विक परिस्थिति खास तौर पर तेल मूल्य तथा वैश्विक ब्याज दर परिवेश लेकिन वफ्द्धि की गति को बनाये रखने तथा मुद्रास्पीतिकारी अपेक्षाओं को स्थिर बनाये रखने के विचार को बराबर वजन देते हुए स्थिति बनी रहेगी। 2004-05 की दूसरी छमाही के लिए मौद्रिक नीति की अवस्थिति गवर्नर महोदय ने उल्लेख किया 2004-05 की पहली छमाही के लिए मौद्रिक प्रबंधन आमतौर पर वार्षिक नीति वक्तव्य में घोषित मौद्रिक नीति अवस्थिति के अनुरूप संचालित किया गया था। अलबत्ता, मौद्रिक प्रबंधन को चलनिधि के ओवरहैंग पर और साथ ही साथ शीर्षस्थ थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्पीति के प्रत्याशित स्तर से परे तक बढ़ जाने और मुद्रास्पीतिकारी अपेक्षाओं के लिए जटिलताओं जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। रिज़र्व बैंक अनिवार्य रूप से दो विलेखों अर्थात् बाज़ार स्थिरीकरण योजना तथा चलनिधि समायोजन सुविधा के ज़रिए चलनिधि का प्रबंध करने का प्रयास करता है। जैसे जैसे बाज़ार स्थिरीकरण योजना के अंतर्गत मात्राएं बढ़ती गयीं, चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत प्रत्यक्ष चलनिधि घटती गयी। चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत चलनिधि में गिरावट से अल्प अवधि के लिए प्रतिपल वक्र को स्थिर बनाये रखने में मदद मिली। यह सीबीएलओ दरों, बाज़ार रेपो दरों तथा ओवरनाइट कॉल मनी दरों के धीरे-धीरे चलनिधि समायोजन सुविधा रेपो दरों की ओर बढ़ते जाने से देखा जा सकता था। अलबत्ता, यह पाया गया था कि चलनिधि समायोजन सुविधा रेपो की 7 दिन की न्यूनतम अवधि के कारण चलनिधि कुछ हद तक एक जगह इकट्ठी हो गयी थी जिसकी वजह से अल्पावधि दरों में, खास तौर पर सरकारी प्रतिभूतियों की प्राथमिक नीलामियों के समय के आस-पास उछाल आया। तदनुसार, अगस्त में चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत चलनिधि प्रवाहों को नरम बनाने तथा उछाल को रोके रखने के लिए ओवरनाइट पिक्स्ड रेट रेपो शुरू किया गया था। हालांकि, पूंजी आगमनों में गिरावट तथा उच्चतर ऋण मांग की वजह से बेहतर तरीके से घरेलू प्रंट पर राशियां खपाये जाने के मिलेजुले प्रभाव के कारण अतिरिक्त चलनिधि को नीचे लाया जा सका, यह अभी भी 67000 करोड़ रुपये की ऊंची मात्रा के आस-पास बनी हुई है जैसा कि बाज़ार स्थिरीकरण योजना तथा चलनिधि समायोजन सुविधा की सम्मिलित मात्रा से देखा जा सकता है। चालू वर्ष के दौरान सरकारी प्रतिभूति बाज़ार में मुद्रास्पीति परिदृश्य का समझ आने योग्य असर रहा है। जैसे जैसे शीर्षस्थ थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्पीति बढ़ती गयी, सरकारी ऋण बाज़ार ने बहुत अधिक उछाल दर्शाया और बहुमूल्य धातुओं के मूल्य में कुल मिला कर गिरावट आयी। अलबत्ता, बाज़ार स्थिर बने रहे क्योंकि मुद्रास्पीति के कारण तथा नीतिगत प्रतिक्रियाएं स्पष्ट हो गये बैंकों के साथ परामर्श तथा बैंकों के निवेश पोर्टपोलियो के हैल्ड टू मैच्युरिटी श्रेणी में वर्गीकरण पर सितंबर में जारी किये गये विवेकशील मानदंड ने भी बाज़ारों को आश्वस्त बनाये रखने में मदद दी। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि अर्थव्यवस्था में बढ़ते हुए खुलेपन ने थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के बीच की खाई को और चौड़ा किया है। इसी तरह के लक्षण उत्पादकों के स्तर पर तथा उपभोक्ता के स्तर पर मूल्य सूचकांकों के बीच, यूरो क्षेत्र में देशों के अलावा अधिकांश देशों में देखे गये हैं। अंतर्राष्ट्रीय तथा देशी घटकों के बीच थोक मूल्य सूचकांकों में वफ्द्धि की व्याख्या करने में पहले वाले देश प्रमुख रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय घटक मुख्य रूप से तेल, लौह अयस्क, कोयला खनन तथा लोहे और इस्पात से संबंध रखते हैं लेकिन कुछ हद तक ब्याज दरों और विनिमय दरों सहित वित्तीय बाज़ारों से भी संबंध रखते हैं। व्यापक अनौपचारिक क्षेत्र तथा इस तथ्य को देखते हुए कि जनसंख्या के बहुत बड़े हिस्से को मुद्रास्पीति से कोई शरण नहीं मिलती, मुद्रास्पीतिकारी अपेक्षाओं को काबू में रखने के लिए दृढ़ प्रयास किये जाने की ज़रूरत है। गवर्नर महोदय ने स्पष्ट किया कि वार्षिक नीति वक्तव्य के घोषणा के बाद निम्नलिखित सुविचारित कार्य किये गये थे: पहला, रिज़र्व बैंक ने कई मौकों पर बाज़ार को मुद्रास्पीति की प्रवफ्ति के बारे में अपने आकलन से अवगत कराया। दूसरा, मुद्रास्पीति की आपूर्ति संबंधी प्रवफ्ति को देखते हुए सरकार ने राजकोषीय उपाय, खास तौर पर तेल के संबंध में, शुरू किये। निगमों द्वारा अपनी मूल्य शक्ति को कम करने के लिए राजकोषीय कार्रवाइयां तथा कुछ उपाय नपे-तुले लेकिन सौहादपूर्ण कार्यों का हिस्सा थे जो कि चलनिधि प्रबंधन में मौद्रिक नीति कार्यों के साथ किये गये थे। तीसरी बात, रिज़र्व बैंक चलनिधि के ओवरहैंग की स्थिति से निपट सके इसके लिये सरकार ने बाज़ार स्थिरीकरण योजना के अंतर्गत अधिकतम सीमा को 60000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 80000 करोड़ रुपये कर दिया। चौथी बात, चलनिधि के और अधिक लचीले प्रबंधन के लिए चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत ओवरनाइट पिक्स्ड रेट रेपो शुरू किया गया था। पांचवा, सीआरआर में एक प्रतिशत पॉइंट के आधे की वफ्द्धि करके उसे 5.0 प्रतिशत कर दिया गया। इसके अलावा पात्र सीआरआर शेष राशियों पर ब्याज दर को बैंक दर से अलग कर दिया गया और इसे घटा कर 3.5 प्रतिशत वार्षिक कर दिया गया। गवर्नर महोदय ने आश्वासन दिया कि रिज़र्व बैंक सीआरआर को उसके 3.0 प्रतिशत के सांविधिक न्यूनतम तक घटाने के अपने मध्यकालिक लक्ष्य के लिए प्रयास करना जारी रखेगा। रिज़र्व बैंक ने सीआरआर को बढ़ाने का निर्णय, आंशिक रूप से प्रणाली में चलनिधि को खपाने के लिए किया लेकिन इसके पीछे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि चलनिधि के अस्वीकार्य स्तरों पर बैंक की चिंता का यह संकेत भी था ताकि वित्तीय बाज़ार स्थितियों में स्थिरता की महत्ता पर ज़ोर देते हुए मुद्रास्पीतिकारी अपेक्षाओं को नरम बनाये रखा जाए। गवर्नर महोदय ने मौद्रिक प्रबंधन प्रयोजन के लिए प्रमुख मैक्रोइकॉनॉमिक तथा मौद्रिक सकल निर्धारित किये : (व) कुछेक अनुमानों के अंतर्गत पहले अनुमान लगायी गयी सकल देशी उत्पाद वफ्द्धि 6.5 - 7.0 की तुलना में 2004-05 में 6.0 से 6.5 प्रतिशत के बीच रखी गयी; (वव) मुद्रास्पीति, बिंदु दर बिंदु आधार पर पहले के अनुमान की 5.0 प्रतिशत की तुलना में 6.5 प्रतिशत हो सकती है; (ववव) एम3 में विस्तार पहले की गयी उम्मीद के अनुसार 14.0 प्रतिशत के आस-पास रहेगा; (वख्) सकल जमाराशियों में वफ्द्धि पूर्व अनुमानित 218000 करोड़ रुपये के आसपास होंगे तथा सरकारी क्षेत्र के उद्यमों तथा निजी क्षेत्र के उद्यमों ने बांडों/डिबेंचरों/शेयरों में निवेश सहित गैर-खाद्यान्न ऋण, वाणिज्यिक पेपर 19.0 प्रतिशत के आस-पास बढ़ने की उम्मीद है जोकि पहले लगाये अनुमान के 16.0 - 16.5 प्रतिशत से अधिक है; बैंकिंग क्षेत्र से सरकार के कम उधारों की वजह से मुद्रा आपूर्ति पर अनुचित दबाव डाले बिना उच्चतर ऋण विस्तार को खपाया जा सकेगा। यदि सरकारी उधार किसी वजह से अधिक होते हैं तो बाज़ार स्थिरीकरण योजना का विस्तार करके इस तरह के उधार खपाये जा सकेंगे। गवर्नर महोदय ने आगे कहा कि अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में किसी प्रतिकूल अथवा अनपेक्षित गतिविधियों को छोड़ कर तथा मुद्रास्पीतिकारी स्थिति को देखते हुए वर्ष की पहली छमाही के दौरान गतिविधियों के अनुरूप 2004-05 दूसरी छमाही के दौरान मौद्रिक नीति की समग्र अवस्थिति इस प्रकार होगी :
वित्तीय क्षेत्र के सुधार तथा मौद्रिक नीतिगत उपाय गवर्नर महोदय ने कहा कि ऐसे चरण में जहाँ वित्तीय संस्थाओं में कार्पोरेट गवर्नेंस को सुदृढ़ करने पर बल दिया जा रहा है, वहीं ऋण संवितरण तंत्र का विस्तार करने सामान्य जन के लिए लेन-देन कार्य सुगम बनाने तथा वित्तीय क्षेत्र में हुए सुधार के लाभों की परामर्शी प्रक्रिया को और व्यापक बनाने के माध्यम से समेकित करने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। मौद्रिक उपाय (क) बैंक दर - 6.0 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखी गई है।
(ख) रिपो दर वर्तमान मैक्रोइकॉनॉमिक तथा समग्र मौद्रिक स्थितियों को देखते यह निर्णय लिया गया है:
रिवर्स रिपो दर वर्तमान के अनुसार रिपो दर से जुड़ी रहेगी। अलबत्ता, रिपो दर तथा रिवर्स रिपो दर के बीच स्प्रेड 150 आधार बिंदु से 25 आधार बिंदु घटाकर 125 आधार बिंदु कर दिया गया है। तदनुसार, एलएएप के अंतर्गत स्थिर रिवर्स रिपो दर 6.0 प्रतिशत पर बनी रहेगी। जैसा कि पहले ही घोषणा की गयी है, यह प्रस्ताव है कि 29 अक्तूबर 2004 से ‘रेपो’ तथा रिवर्स रेपो शब्दों के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयोग अपनाया जाए। इस परिवर्तन के अनुसार फिक्स्ड रिवर्स रेपो दर 4.75 प्रतिशत होगी तथा 125 आधार बिंदु पर स्प्रेड के साथ रेपो दर 6.0 प्रतिशत दर उपलब्ध रहेगी।
(क) संशोधित चलनिधि समायोजन सुविधा एलएएप की कारगरता को और बढ़ाने तथा लचीली रीति से चलनिध प्रबंधन सुगम बनाने की दृष्टि से यह प्रस्ताव किया गया है कि :
ब्याज दर नीति
(क) विदेशी अनिवासी भारतीय जमाराशियों की ब्याज दर की अधिकतम सीमा अनिवासी (विदेशी) रुपया (एनआरई) जमाराशियों पर ब्याज दर को अंतर्राष्ट्रीय ब्याज दर के समरूप बनाने के लिए, एनआरई जमाराशियों पर अधिकतम सीमा तदनुरूपी परिपक्वता की अमेरीकी डॉलर लिबोर/स्वेप दर से संबंद्ध थी। समीक्षा के पश्चात यह प्रस्ताव है कि -
(ख) एपसीएनआर (बी) जमाराशियों पर ब्याज दर निर्धारण ब्याज दर निर्धारण के संबंध में सुसंगति लाने की दृष्टि से तथा बैंकों से प्राप्त सुझावों के आधार पर यह प्रस्ताव है कि :
(ग) देशी मीयादी जमाराशियों की अवधि (टेनॅर) में कमी मीयादी जमाराशियों की अवधि में एकरूपता लाने की दृष्टि से, यह प्रस्ताव है कि-
ऋण सुपुर्दगी तंत्र
(क) सेवा क्षेत्र दृष्टिकोण : प्रतिबंधक उपबंध हटाना बैंक अपने ऋण सुपुर्दगी तंत्र को सुगम बना सकें, इस दृष्टि से प्रस्ताव है कि:
(ख) प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण (व) वफ्षि तथा निविष्टि (इनपुट) वितरण के लिए ऋण सीमा वफ्षि क्षेत्र को ऋण वितरण में और अधिक सुधार लाने की दृष्टि से यह प्रस्ताव है कि:
(वव) लघु तथा सीमांत वफ्षकों के लिए ऋण सीमा वफ्द्धि लघु तथा सीमांत वफ्षकों को ऋण प्रवाह में सुधार की दृष्टि से यह प्रस्ताव है कि:
(ववव) विशेष वफ्षि ऋण योजना वफ्षि को ऋण प्रवाह की वफ्द्धि की दृष्टि से यह प्रस्ताव है कि विशेष वफ्षि ऋण योजना का विस्तार निजी क्षेत्र के बैंकों तक किया जाये। तदनुसार,
(वख्) लघु औद्योगिक इकाइयों को संमिश्र ऋण में वफ्द्धि लघु औद्योगिक क्षेत्र को सुगम ऋण प्रवाह की सुविधा की दृष्टि से प्रस्ताव है कि:
(ख्) बैंकों द्वारा लघु औद्योगिक क्षेत्र से संबंधित प्रतिभूतिवफ्त आस्तियों में निवेश लघु औद्योगिक क्षेत्र को ऋणों के प्रतिभूतिकरण को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से, यह प्रस्ताव है कि:
(ख्व) आवास ऋण : अधिकतम सीमा बढ़ाना आवास निर्माण के क्षेत्र में ऋण प्रवाह में और अधिक सुधार करने की दृष्टि से यह प्रस्ताव है कि:
(ग) शहरी निर्धनों को वित्तपोषण शहरी निर्धनों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली के अंतर्गत लाने की दफ्ष्टि से :
(घ) व्यष्टि वित्त वर्ष 2004-05 के केंद्रीय बजट में की गयी घोषणा के अनुसार 5.85 लाख स्वयं सहायता समूहों की ऋण संबद्धता मार्च 2007 तक पूरी की जानी है। उन क्षेत्रों में जहाँ लिंकेज अपेक्षावफ्त कम हैं, वहाँ इसमें आए अवरोधों का पता लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। (ङ) किसान क्रेडिट काड़ योजना - सर्वेक्षण की अनुवर्ती कार्रवाई किसान काड़ योजना के अंतर्गत वफ्षि क्षेत्र को ऋण प्रवाह में और अधिक सुधार लाने की दृष्टि से, भारतीय बैंक संघ को सूचित किया गया है कि वह एनसीएईआर अपने राष्ट्रीय इंपेक्ट असेसमेंट सर्वेक्षण के एक अंग के रूप में दिए गए सुझावों पर विचार करे तथा सुधार संबंधी कार्रवाई करे। (च) ग्रामीण आधारभूत संरचना विकास निधि : स्थिति जैसा कि वर्ष 2004-05 के केंद्रीय बजट में घोषणा की गयी है, 8,000 करोड़ रुपये की कार्पस निधि के साथ आरआइडीएप एक्स की स्थापना की गयी हैं।
(छ) मझौले उद्यमों के लिए ऋण पुनर्व्यवस्थापन तंत्र मझौले क्षेत्र के उद्यमों के ऋण पुनर्व्यवस्थापन के लिए तंत्र विकसित करने के लिए एक विशेष दल (अध्यक्ष: श्री जी. श्रीनिवासन) का गठन किया गया है। अपेक्षा की जाती है कि यह दल शीघ्र ही अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाला है। इसे शीघ्र ही पाब्लिक डोमेन पर रखा जायेगा।
(ज) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने क्षेत्रीय कार्यालयों में यह सुनिश्चित करने के लिए कि क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक बेहतर गवर्नेंस तथा विवेकपूर्ण विनियमों का अनुपालन करते हैं, उच्चाधिकारप्राप्त समितियों का गठन किया है। इन समितियों में नाबाड़, प्रायोजक बैंक, एसएलबीसी के संयोजक तथा राज्य सरकारों के प्रतिनिधि सदस्य हैं। ये समितियाँ परिचालन संबंधी विषयों पर भी ध्यान देंगी तथा विनियामक प्रश्नों के संबंध में स्पष्टीकरण प्रदान करेंगी।
(झ) ग्रामीण सहकारी बैंकों में पुनरुज्जीवन : स्थिति सरकार ने एक कार्य दल (अध्यक्ष प्रो. ए. वैद्यनाथन) का गठन किया है जो ग्रामीण सहकारी बैंकिंग संस्थाओं के पुनरुज्जीवन की कार्य योजना प्रस्तावित करेगा तथा इन संथाओं के लिए उपयुक्त विनियामक प्रेमवर्क का सुझाव देगा। कार्यदल के शीघ्र ही रिपोर्ट प्रस्तुत करने की अपेक्षा है। (ञ) वफ्षि क्षेत्र को ऋण : प्रगति की समीक्षा 18 जून 2004 को सरकार द्वारा उपायों की घोषणा करने के अनुसरण में भारतीय रिज़र्व बैंक तथा भारतीय बैंक संघ ने वाणिज्यिक बेंकों को नीतिनिर्देश जारी किये। नाबाड़ ने भी सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को नीति निर्देश जारी किये। इस दिशा में प्रगति उत्साहवर्धक है तथापि बैंंकों से अपेक्षा की गयी है कि वे गति बनाये रखें।
(ट) गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को बैंक ऋण का उदारीकरण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों द्वारा सेकंडहैंड आस्तियों के वित्तपोषण में विशेषज्ञता प्राप्त करने को देखते हुए तथा ऋण उपलब्ध कराने को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से प्रस्ताव है कि -
(ठ) निर्यातकों के लिए स्वर्ण काड़ योजना : स्थिति सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश बैंकों और निजी क्षेत्र के अनेक बैंकों तथा विदेशी बैंकों ने ऋण के लिए पात्र निर्यातकों के लिए स्वर्ण काड़ योजना संबंधी दिशानिर्देश घोषित कर दिये हैं जिनके अनुसार स्वर्ण काड़ धारकों को ऋण की बेहतर शर्तों और दरों पर ऋण प्रदान किये जाते हैं। (ड.)राज्य सरकारों द्वारा ऋण को बढ़ाये जाने के संबंध में कार्य दल की रिपोर्ट राज्य सरकारों द्वारा ऋण को बढ़ाये जाने के संबंध में कार्य दल उक्त लिखतों की जांच कर रब है जिन्हें राज्य सरकारें बुनियादी संरचना संबंधी परियोजनाओं के संस्थागत वित्तपोषण के लिए राज्यों के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों/विशेष प्रयोजनवाली संस्थाओं की उधार दर/उधारकर्ता की क्षमता को सुधारने के लिए दे सकते हैं। आशा है कि उक्त समूह शीघ्र ही अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देगा। मुद्रा बाजार (क) पूर्णत: अंतर बैंक मांग/सूचना मुद्रा बाजार की ओर बढ़ना बाजार का और विकास करने तथा पूर्णत: अन्तर बैंक मांग/सूचना मुद्रा बाजार की ओर बढ़ने की दृष्टि से यह प्रस्ताव है कि :
(ख) वाणिज्यिक पत्र वाणिज्यिक पत्र बाजार का और विकास करने की दृष्टि से सुझावों और बाजार के फीडबैक को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित उपायों का प्रस्ताव है :
(ग) संपार्श्विवफ्त उधार लेने और देने का दायित्व संपार्श्विवफ्त उधार लेने और देने के दायित्व संबंधी घटक की ओर बढ़ने के लिए बाजार सहभागियों और सीसीआइएल के बीच प्रतिभूतियों का आटोमेटेड वैल्यू प्री ट्रांसफर करने को सुविधाजनक बनाया गया। सरकारी प्रतिभूति बाजार
(क) निगोशिएटेड डीलिंग सिस्टम : अगला कदम एक कार्य दल (अध्यक्ष : डॉ. आर.एच.पाटील) ने निगोशिएटेड डीलिंग सिस्टम के कार्य-निष्पादन और इसकी परिचालनगत दक्षता की समीक्षा की और निगोशिएटेड डीलिंग सिस्टम पर एक बेनामी इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन आधारित आदेश के अनुसार लेनदेन प्रणाली चालू करने की सिफारिश की। उक्त समूह की रिपोर्ट को व्यापक प्रसार देने के लिए पब्लिक डौमेन पर रखा गया है।
(ख) कैपिटल इंडेक्स बांडों की शुरुआत : यह आशा की जाती है कि कैपिटल इंडेक्स बांडों की शुरुआत सरकार से सलाह करके वर्ष 2005-06 के दौरान कर दी जायेगी। (ग) प्राथमिक व्यापारी संबंधी कार्य दल : सरकारी प्रतिभूति बाजार में प्राथमिक व्यापारियों की भूमिका का मूल्यांकन करने संबंधी उप समूह (अध्यक्ष: डॉ. आर.एच.पाटील) की रिपोर्ट को सूचनार्थ तकनीकी परामर्शी समिति के समक्ष रखा जा रब है ताकि उस पर आगे की कार्रवाई हो सके। (घ) सीसीआइएल के माध्यम से ओटीसी डेरिवेटिव का निपटान: स्थिति सीसीआइएल ने ओटीसी डेरिवेटिव के निपटान के लिए मूल्य निर्धारण और जोखिम मॉडलों का विकास किया है जिसमें बाजार प्रतिसूचना के आधार पर सुधार किया जा रब है। आशा है कि समाशोधन व्यवस्था का परिचालन मार्च 2005 तक शुरू बे जाएगा। (ङ) कंपनी ऋण संबंधी समूह : स्थिति कंपनी ऋण बाजार का और अधिक विकास करने की दृष्टि से एक समूह का गठन किया गया जिसके सदस्य भारतीय रिज़र्व बैंक, सेबी और अन्य बाजार सहभागियों से लिए गए थे। उक्त समूह द्वारा जनवरी 2005 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देने की संभावना है। (च) बाजार स्थिरीकरण योजना : समीक्षा बाजार स्थिरीकरण योजना के अंतर्गत सरकार की बकाया बाध्यता संबंधी उच्चतम सीमा 60,000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 80,000 करोड़ रुपए कर दी गयी है तथा उच्चतम सीमा की और समीक्षा के लिए आरम्भिक स्तर 70,000 करोड़ रुपए निर्धारित किया गया है। 21 अक्तूबर 2004 तक 54,146 करोड़ रुपए के खजाना बिल और दिनांकित प्रतिभूतियां जारी की गयीं जिनमें से 25,000 करोड़ रुपए की दिनांकित प्रतिभूतियां थी। () खुला बाजार परिचालन (ओएमओ) व्यवस्था को सुदृढ़ करना राजकोषीय जिम्मेवारी तथा बजट प्रबंध अधिनियम में यह निर्धारित किया गया है कि 1 अप्रैल 2006 से सरकारी प्रतिभूतियों के प्राथमिक निर्गम में भारतीय रिज़र्व बैंक की सहभागिता समाप्त बे जायेगी। तदनुसार, ओएमओ व्यवस्था को सुदृढ़ करने के प्रयोजन से एक अध्ययन समूह का गठन किया जाएगा ताकि वह उभरती हुई आवश्यकताओं को पूरा कर सके तथा भारतीय रिज़र्व बैंक तथा बाजार सहभागियों को उसके लिए समुचित रूप से तैयार कर सके। विदेशी मुद्रा बाजार (क) व्यापार ऋण के लिए गारंटी का मुद्दा : उदारीकरण निवेश कार्यकलाप को बढ़ावा देने तथा आयात संबंधी व्यापार ऋण से संबंधित प्रक्रियाओं को और अधिक उदार बनाने के लिए यह प्रस्ताव है कि :
(ख) निर्यातोन्मुख यूनिट : निर्यात वसूली के लिए समय-सीमा में ूट सरकारी विदेश व्यापार नीति के संबंध में सितंबर 2004 में की गयी घोषणा के अनुरूप यह प्रस्ताव है कि
(ग) वायदा संविदाएं बुक करना : रियायत वायदा संविदाएं बुक करने की प्रक्रिया को और उदार बनाने की दृष्टि से यह प्रस्ताव है कि:
(घ) विदेशी मुद्रा बाजॉर समूह विदेशी मुद्रा बाजार में रिज़र्व बैंक द्वारा अब तक की गयी पहलों की व्यापक समीक्षा करने तथा आगे और सुधार करने के क्षेत्रों की पहचान करने की दृष्टि से एक आंतरिक दल गठित किये जाने का प्रस्ताव है। उक्त दल बाजार के सहभागियों तथा तकनीकी परामर्शी समिति (टीएसी) से परामर्श करेगा तथा तीन महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। (ङ) व्यापार से संबंधित उपायों के प्रभाव के बारे में सर्वेक्षण बल की अवधि में काफी मात्रा में दी गयी ूटों तथा क्रियाविधियों के सरलीकरण के मद्देनजर यह प्रस्ताव है कि निर्यातों की लेनदेन लागत घटाने के संबंध में रिज़र्व बैंक द्वारा किये गये उपायों के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए नये सिरे से एक सर्वेक्षण किया जाए। विवेक सम्मत उपाय क) बासले घ्घ् मानदंडों को अपनाना : भावी कदम बासले घ्घ् को अपनाने में निहित जटिलताओं को देखते हुए एक संचालन (स्टीयरिंग) समिति गठित की गयी है जिसके सदस्य बैंकों, भारतीय बैंक संघ (आइबीए) और रिज़र्व बैंक से लिये गये हैं। रिज़र्व बैंक निविष्टियों के आधार पर बासले घ्घ् मानदंड को लागू करने के लिए दिशा-निर्देशों का प्रारूप तैयार करेगा और उसे पब्लिक डोमेन पर रखा जायेगा।
(ख) स्वामित्व और संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों का प्रारूप निजी क्षेत्र के बैंकों में स्वामित्व और संचालन के लिए नीति संबंधी रूपरेखा पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं और विविध पणधारियों (स्टेक होल्डर्स) के साथ हुई चर्चाओं पर आधारित दूसरे प्रारूप को अंतिम रूप दिया गया है और उसे शीघ्र ही पब्लिक डोमेन पर डाला जायेगा। (ग) बैंकों के निदेशकों के लिए उपयुक्त और उचित मानदंड : स्थिति बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के निदेशकों के परामर्शदात्री दल (अध्यक्ष : डॉ. ए.एस.गांगुली) ने बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के बोर्डों की पर्यवेक्षी भूमिका को मजबूत करने के लिए कई सुझाव दिये हैं। इस संबंध में निजी क्षेत्र के बैंकों को दल की सिफारिशों के आधार पर आवश्यक अनुदेश पहले ही जारी किये जा चुके हैं। (घ)पारदर्शिता : दण्डों/निदेशों को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना बासले घ्घ् के अंतर्गत बाजार अनुशासन की भूमिका पर दिये गये अतिरिक्त बल को देखते हुए पारदर्शिता और अधिक बढ़ाने की दृष्टि से बैंकों को 19 अक्तूबर 2004 को सूचित किया गया है कि वे रिजॅर्व बैंक द्वारा लगाये गये दण्ड के सभी मामले तथा साथ ही निरीक्षण से सामने आये विशिष्ट मामलों पर की गयी आलोचना/दिये गये निदेशों को पब्लिक डोमेन पर डालें। (ङ) गोदाम रसीदें और पण्य व े भावी सौदे : बैंकों की भूमिका गोदाम रसीदों के आधार पर ऋण प्रदान करने में बैंकों की भूमिका की जांच करने और पण्य के भावी सौदों के बाजारों में बैंकों की सहभागिता के लिए एक ढांचा बनाने के लिए प्रस्ताव है कि:
(च) कम्पनी ऋण पुनर्संरचना प्रणाली की समीक्षा कम्पनी ऋण पुनर्संरचना प्रणाली के कार्य-निष्पादन की समीक्षा करने और उसे अधिक प्रभावी बनाने के लिए और उपाय सुझाने के लिए एक विशेष दल का गठन किया गया। आशा है कि यह दल दिसंबर 2004 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देगा।
(छ) आवास ऋण और उपभोक्ता ऋण : अस्थायी जोखिम नियंत्रण हाल में यह देखने आया है कि आवास ऋण और उपभोक्ता ऋण की वफ्द्धि बहुत मज़बूत रही है। उस प्रवफ्त्ति को उलटने के अस्थायी उपाय के रूप में यह प्रस्ताव है कि -
(ज) गैर एसएलआर प्रतिभूतियों में बैंकों का निवेश : स्थिति गैर एसएलआर निवेशों के बारे में बैंकों द्वारा विवेकपूर्ण मानदंडों को लागू करने के लिए संक्रमण अवधि दिसंबर 2004 तक दी गयी थी। तदनुसार, बैंकों से अपेक्षित है कि वे विवेकपूर्ण मानदंडों की अपेक्षाओं को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने के लिए अपने आपको तैयार करें।
(झ) वित्तीय संस्थाओं की शंकास्पद आस्तियों के वर्गीकरण के लिए विवेकशील मानदंड बेहतरीन अंतर्राष्ट्रीय प्रथाओं के निकटतर पहुंचने और वित्तीय संस्थाओं को लागू मानदंडों को बैंकों के समकक्ष लाने के लिए प्रस्ताव है कि :
(ञ) वित्तीय संस्थाओं के पर्यवेक्षण के लिए दृष्टिकोण विकास वित्तीय संस्थान पर कार्यदल (अध्यक्ष: श्री एन.सदाशिवन) की सिपारिशों तथा उस पर प्राप्त प्रतिक्रिया के आधार पर विकास वित्त संस्थाओं और बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के पर्यवेक्षण के लिए निम्नलिखित दृष्टिकोण अपनाया जाए:
(ट) सीआइबीआइएल द्वारा ऋण संबंधी जानकारी का प्रसार बैंकों से अनुरोध है कि वे अपने सभी उधारकर्ताओं की सहमति प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करें कि वे तीव्रतर गति से ऋण प्रदान करने के लिए सुविधा देने के अलावा, सक्षम ऋण संबंधी जानकारी प्रणाली तैयार करें जिससे ऋण संबंधी निर्णयों की गुणवत्ता को बढ़ाने एवं बैंकों की आस्तियों की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सके।
(ठ) भारतीय वित्तीय सेवा क्षेत्र में हितों के टकरावों के बारे में कार्यदल सेबी के अध्यक्ष और आइआरडीए के अध्यक्ष के साथ परामर्श करके प्रस्ताव है कि :
शहरी सहकारी बैंक
(क) भावी दृष्टिकोण (विज़न डॉक्यूमेंट) भविष्य में शहरी सहकारी बैंकों की भूमिका के बारे में दिये गये प्रलेख में यह व्यवस्था है कि जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा हो और स्थानीय समुदायों को उपयोगी सेवा देते समय दुविधा से बचा जा सके। इसके अलावा रिज़र्व बैंक द्वारा राज्य और केन्द्र सरकारों के साथ सम्पर्क बनाए रखा जाएगा ताकि उनके अधिकार क्षेत्रों में आने वाली समस्याओं को जाना जा सके।
(ख) शहरी सहकारी बैंकों से सम्बन्धित स्थायी सलाहकार समिति शहरी सहकारी बैंकों से सम्बन्धित संरचनागत/नियामक और पर्यवेक्षण सम्बन्धी मुद्दों को सुलझाने के लिए परामर्शदाता प्रक्रिया को अधिक रचनात्मक विधि से लागू करने की दृष्टि से और इस क्षेत्र के लिए भावी दृष्टिकोणों के निर्माण की प्रक्रिया में सुविधा देने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक के उप-गवर्नर की अध्यक्षता में स्थायी सलाहकार समिति की बैठक भविष्य में तिमाही आधार पर होगी। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां
(क) अवशिष्ट गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों के लिए रोड-मैप रिज़र्व बैंक के निदेशों का अनुपालन करने के लिए आरएनबीसी के संक्रमण की प्रक्रिया को सहज बनाने की दृष्टि से निम्नलिखित उपायों का प्रस्ताव है:
अलबत्ता, भारतीय रिज़र्व बैंक का अभिप्राय है कि आरएनबीसी के क्रियाकलापों में सुधार पर ध्यान दिया जाए ताकि जमाकर्ताओं को समुचित सेवाएँ और प्रणालीगत जोखिम से बचाना सुनिश्चित हो सके। आरएनबीसी द्वारा इस संबंध में की जाने वाली कार्रवाई के बारे में व्यापक दिशानिदेश अलग से जारी किए जा रहे हैं।
(ख) गैर-बैंकिंग कम्पनियॉ: जनता की जमाराशियों की चरणबद्ध चुकौती भारतीय रिज़र्व बैंक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के साथ विचार विमर्श करेगा ताकि उन्होंने जनता से जो जमाराशियाँ स्वीकार की हैं, उन राशियों को स्वैच्छिक रूप से चुकाने की कार्य योजना तैयार करने पर चर्चा की जा सके और रिज़र्व बैंक द्वारा यथोचित रूप से बैंकों द्वारा एनबीएपसी को उधार देने पर नियन्त्रण किया जा सके।
(ग) आस्ति पुनर्संरचना कम्पनियां : पूंजी आधार का विस्तार करना अभिगफ्हीत की गयी गैर निष्पादक आस्तियों में एआरसी के सुदृढ़ पूंजी आधार और हिस्सेदारी को सुनिश्चित करने के लिए यह निर्धारित किया गया है कि व्यवसाय शुरू करने के लिए स्वामित्वाधीन निधियाँ अभिग्रहीत आस्ति के 15 प्रतिशत या 100 करोड़ रुपये, दोनों में जो कम हो, से कम नहीं होनी चाहिए। पुनर्वित्त संस्थाओं से सम्बन्धित तकनीकी समूह : स्थिति आशा है कि पुनर्वित्त संस्थाओं से सम्बन्धित तकनीकी समूह (अध्यक्ष: श्री जी.पी.मुनियप्पन) की रिपोर्ट दिसम्बर 2004 तक प्रस्तुत हो जाएगी।
केन्द्रीय डाटाबेस प्रबन्धन प्रणाली से सम्बन्धित विशेषज्ञ समूह : स्थिति केन्द्रीय डाटाबेस प्रबन्धन प्रणाली (सीडीबीएमएस) से सम्बन्धित विशेषज्ञ समूह (अध्यक्ष : प्रोपेसर ए.वैद्यनाथन) ने अपनी सिपारिशों को पब्लिक डोमेन पर डाल दिया गया है। यह प्रस्ताव है कि आंकड़ों की द्राफ्ंखला में पहली खेप पहली नवम्बर 2004 से जारी कर दी जाए जिसमें महत्त्वपूर्ण समष्टि आर्थिक संकलन शामिल किए जाएँगे। भुगतान और निपटान प्रणाली : स्थिति
(क) भुगतान और निपटान प्रणाली के लिए भावी दृष्टिकोण (विज़न डॉक्यूमेंट) रिज़र्व बैंक ने राष्ट्रीय भुगतान परिषद (एनपीसी) के मार्गदर्शन में ‘भुगतान और निपटान : 2005-08 के लिए भावी दृष्टिकोण’ नामक दस्तावेज़ का प्रारूप तैयार करने के लिए कदम उठाये है। यह प्रारूप प्रतिसूचनाओं और विचार-विमर्श के लिए पब्लिक डोमेन पर डाला जायेगा।
(ख) भुगतान और निपटान प्रणाली बोड़ भुगतान और निपटान प्रणाली बोड़ की स्थापना के सन्दर्भ में विनियमन का ड्राप्ट राजपत्र (गजट) में प्रकाशन हेतु सरकार के पास भेज दिया गया है।
(ग) राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली केन्द्रीवफ्त निपटान हेतु रिज़र्व बैंक और अन्य बैंकों के प्रबंध में आनेवाले विभिन्न समाशोधन गफ्हों को जोड़ने वाली राष्ट्रीय निपटान प्रणाली वर्ष 2005 के शुरू में प्रारंभ होने की अपेक्षा है।
(घ) भारतीय खुदरा भुगतान प्रणाली के लिए जोखिम निराकरण संबंधी कार्य दल खुदरा भुगतान प्रणाली के जोखिम निराकरण हेतु उचित नियंत्रण प्रणाली शुरू करने और साथ ही साथ ऐसी प्रणाली में निर्दिष्ट परिचालनात्मक प्रभावों की जांच करने की दृष्टि से रिज़र्व बैंक ने एक कार्य दल गठित किया है जिसमें रिज़र्व बैंक, भारतीय बैंक संघ और बैंकों के प्रतिनिधि शामिल है। यह दल नवम्बर 2004 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
(ङ) इलेक्ट्रॉनिक समाशोधन प्रणाली/इलेक्ट्रॉनिक निधि अंतरण लेनदेन : उच्चतम सीमा हटाना इलेक्ट्रॉनिक समाशोधन प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक निधि अंतरण योजनाओं के व्यापक प्रयोग को सहज बनाने की दृष्टि से इनमें प्रति लेनदेन की वर्तमान सीमाओं को 1 नवम्बर 2004 से समाप्त किया जा रहा है।
(च) कार्डों की विनियामन प्रणाली पर कार्य दल कार्डों की लोकप्रियता के परिप्रेक्ष्य में, तत्संबंधी विनियामक एवं ग्राहक संरक्षण के उपाय महत्त्वपूर्ण हो गये हैं। तदनुसार यह प्रस्ताव है कि :
सरकारी कारोबार का संचलन
(क) ऑन लाइन कर लेखाकरण प्रणाली : स्थिति केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोड़ ने व्यक्तिगत करदाताओं के संदर्भ में चुनिंदा केन्द्रों पर इलेक्ट्रॉनिक समाशोधन प्रणाली (ईसीएस) के माध्यम से 25,000 रुपये तक की धन वापसी के संबंध में रिज़र्व बैंक के सुझाव को स्वीकार कर लिया है ।
(ख) ऑन लाइन अप्रत्यक्ष कर लेखाकरण प्रणाली : स्थिति रिज़र्व बैंक ने सीमा शुल्क और सेवा कर से संबंधित आंकड़ों के संप्रेषण के बारे में वर्तमान प्रणालियों एवं क्रियाविधियों को सुव्यवस्थित करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति (अध्यक्ष : श्री जे.एन.निगम) गठित की है जिसमें भारत सरकार, भारतीय बैंक संघ, भारतीय स्टेट बैंक, प्रतिष्ठित सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों, एनएसडीएल एवं रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधि सदस्य हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय मानक तथा कूट ग्यारह (11) परामर्शदात्री/ तकनीकी दलों की रिपोर्टों में की गयी सिपारिशों के कार्यान्वयन में हुई प्रगति की समीक्षा एक परामर्शदात्री पैनल द्वारा की गयी। इस पैनल के सुझावों को ध्यान में रखते हुए संशोधित ड्राप्ट रिपोर्ट पब्लिक डोमेन पर डाली जा रही है। सूरज प्रकाश प्रबंधक प्रेस प्रकाशनी : 2004-2005/438 |
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