प्रधानमंत्री ने भारतीय रिज़र्व बैंक का इतिहास पुस्तक के खण्डों का विमोचन किया और भारतीय रिज़र्व बैंक के उन्नत वित्तीय अध्ययन केंद्र के फलक का अनावरण किया
18 मार्च 2006
प्रधानमंत्री ने भारतीय रिज़र्व बैंक का इतिहास पुस्तक के खण्डों का विमोचन किया और भारतीय रिज़र्व बैंक के उन्नत वित्तीय अध्ययन केंद्र के फलक का अनावरण किया
भारत के माननीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भारतीय रिज़र्व बैंक का इतिहास पुस्तक के तृतीय खण्ड का विमोचन किया जिसमें 1967 से 1981 के बीच की अवधि कवर की गई है। डा. मनमोहन सिंह ने रिज़र्व बैंक के उन्नत वित्तीय अध्ययन केंद्र का भी फलक अनावरण करके उद्घाटन किया । डा. मनमोहन सिंह, रिज़र्व बैंक के भूतपूर्व गवर्नर, रिज़र्व बैंक का दौरा करनेवाले तथा उसके केंद्रीय बोर्ड की विशेष बैठक को संबोधित करनेवाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं।
यह अवसर भारतीय रिज़र्व बैंक की मौजूदगी के सत्तर वर्ष होने का भी संकेत है।
इस अवसर को स्मरणीय बनाने के लिए श्री पी.चिदम्बरम, केंद्रीय वित्त मंत्री ने मुद्रा और वित्त के संबंध में वर्ष 2004-05 के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट जारी की। रिज़र्व बैंक के इतिहास के साथ समकालिक बनाने के लिए इस रिपोर्ट की विषय-वस्तु "भारत में केंद्रीय बैंकिंग का क्रमिक विकास" रखी गई है।
इस समारोह में महाराष्ट्र के माननीय गवर्नर श्री एस.एम. कृष्णा और माननीय मुख्यमंत्री श्री विलासराव देशमुख उपस्थित थे। इस समारोह में छह गवर्नरों - मौज़ूदा और भूतपूर्व - ने भाग लिया। रिज़र्व बैंक के केंद्रीय निदेशक मंडल के सदस्यों, वरिष्ठ स्टाफ सदस्यों तथा इतिहास परियोजना से संबद्ध अन्य व्यक्तियों एवं बैंकर प्रशिक्षण महाविद्यालय की परिवर्तन समिति के सदस्य इस समारोह के विशेष अमंत्रितियों में से थे।
वर्ष 1935 में स्थापित भारतीय रिज़र्व बैंक ने 2005 में अपनी मौजूदगी के 70 वर्ष पूरे कर लिए। इस अवसर को स्मरणीय बनाने के लिए पहले दो खण्डों के साथ 1967 से 1981 तक की अवधि कवर करनेवाला इसके इतिहास का तीसरा खंड प्रकाशित किया जा रहा है। वर्ष 1935 से 1951 तक की अवधि को कवर करनेवाला प्रथम खंड और वर्ष 1951 से 1967 तक की अवधि को कवर करनेवाला द्वितीय खंड पहले प्रकाशित किया जा चुव ा है। रिज़र्व बैंक के विकास के 46-वर्ष की अवधि के दौरान उसके क्रमिक विकास चरण को समझने में पाठक की सुविधा के लिए इन तीनों खंडों को एक सेट के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। आज ही मुद्रा और वित्त के संबंध में वर्ष 2004-05 की रिपोर्ट भी साथ ही साथ जारी की जा रही है जिसकी विषय-वस्तु भारत में केंद्रीय बैंकिंग के क्रमिक विकास पर केंद्रित है। आशा है कि इनसे पाठक को भारतीय रिज़र्व बैंक की 70 वर्ष से भी अधिक समय तक की मौजूदगी का महत्व समझने में सहायता मिलेगी।
उन्नत वित्तीय अध्ययन केंद्र जिसका आज प्रधानमंत्री ने उद्घाटन किया, भारतीय रिज़र्व बैंक की 50-वर्ष पुरानी प्रशिक्षण संस्था, बैंकर प्रशिक्षण महाविद्यालय का पुन: प्रवर्तन है जिसने वाणिज्यिक और केंद्रीय बैंकरों के बीच कौशल निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण रूप से योगदान दिया है। अनेक परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए जो वित्तीय क्षेत्र में हुए हैं, नये केंद्र का अंतर्निहित प्रयोजन यह है कि वित्तीय क्षेत्र के वरिष्ठ कार्यपालकों और प्रोफेशनलों, देशी और विदेशी दोनों, के लिए अनुसंधान, प्रशिक्षण और चर्चा हेतु एक व्यापक आधारवाला बौद्धिक मंच उपलब्ध कराया जाये।
प्रधानमंत्री ने बड़े प्रेमपूर्वक भारतीय रिज़र्व बैंक में अपने समय को याद किया और रिज़र्व बैंक का गवर्नर रहते हुए उन्होंने जो बात कही थी उसका वर्णन करते हुए केंद्रीय बैंक की भूमिका की सराहना की: "किसी आधुनिक अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए देश के केंद्रीय बैंक और मौद्रिक प्राधिकारियों की नीतियों के गंभीर निहितार्थ हैं... हमारी मौद्रिक और ऋण नीतियों के उद्देश्य राष्ट्र के समग्र सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों के अनुरूप ही होने चाहिए।" उन्होंने कहा कि इस दृष्टि से देखा जाये तो रिज़र्व बैंक ने समाज के विभिन्न वर्गों को ऋण उलब्धता सुनिश्चित करते हुए मूल्य और वित्तीय स्थिरता बनाए रखकर अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि और रोजगार पैदा करने में अपना योगदान किया है। इसके अलावा रिज़र्व बैंक ने अपने गैर-परंपरागत दायित्व भी सफलतापूर्वक निभाए हैं जैसे कि कृषि ऋण, ग्रामीण सहकारी समितियों और विकास वित्त संस्थाओं का विकास। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि रिज़र्व बैंक की भूमिका के ये पहलू आज जारी किए जा रहे इतिहास खंडों में विधिवत् प्रलेखित हैं।
उन्होंने इशारा करते हुए कहा कि अपनी मानव पूंजी और वाणिज्यिक कुशाग्र बुद्धि के अर्थ में अपने सभी अंतर्निहित लाभों के साथ मुंबई को एक व्यवहार्य क्षेत्रीय वित्तीय केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने ध्यानाकर्षित हुए जोर दिया कि इस उद्देश्य की दिशा में कार्य प्रारंभ किया जाना चाहिए। उन्होंने वित्त मंत्री और रिज़र्व बैंक से आगे यह भी आग्रह किया कि वे पूंजी खाते की परिवर्तनीयता के विषय का पुनरावलोकन करें और मौज़ूदा यथार्थ पर आधारित एक रोडमैप तैयार करें। उन्होंने कहा कि इस संबंध हुई प्रगति से मुंबई को न केवल क्षेत्रीय बल्कि एक वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में बदलना आसान होगा।
मुद्रा और वित्त संबंधी रिपोर्ट जारी करते समय वित्त मंत्री ने बैंक के प्रयासों की सराहना की और उल्लेख किया कि केंद्रीय बैंकिंग के क्रमिक विकास की विषयवस्तु से इस अवसर को लाभ मिला है क्योंकि भारत और विश्व में केंद्रीय बैंकिंग की अवधारणा रूपांतरण के दौर से गुज़र रही है। यह उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में वित्तीय क्षेत्र के सुधार 1990 के दशक से चले आ रहे आर्थिक सुधारों का एक अविभाज्य अंग रहे हैं। वित्त मंत्री ने बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप इसे लाने और इसे प्रतिस्पर्धी बनाने में भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका की सराहना की। वित्त मंत्री ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि उत्पादक क्षेत्र को ऋण का प्रवाह सुनिश्चित करने के आर्थिक वृद्धि में योगदान करते हुए रिज़र्व बैंक अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सफल रहा है। उन्होंने कहा जैसा कि प्रधानमंत्री ने संकेत किया है कि चूंकि भारत ने उच्च वृद्धि के पथ पर अग्रसर होना प्रारंभ किया है, वित्तीय क्षेत्र को बचतकर्त्ताओं से संसाधनों का संग्रहण करने और उत्पादक कार्यों में उसे दक्षतापूर्वक लगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है। उन्होंने कहा कि वित्तीय समावेशन, क्रेडिट कार्ड जारी करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत, करेंसी की मांग का प्रबंध और स्वच्छ नोट नीति जैसे हाल ही के कुछ भारतीय रिज़र्व बैंक अनुदेशों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वित्त मंत्री ने देश के पूंजी बाजार में देशी और वैश्विक निवेशकों का विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने आगे इस बात पर भी जोर दिया कि वित्तीय क्षेत्र के शेष संरचनागत ढांचे का वह हिस्सा जो पूरी तरह से एकीकृत नहीं है, के साथ परस्पर संबंधों में आ रही कठिनाइयों को दूर करने की आवश्यकता है। उन्होंने आशा व्यक्त की, कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था और खुलेगी, विगत 70 वर्षों में रिज़र्व बैंक ने सतत परिवर्तन के जिस पक्ष का अनुसरण दर्शाया है, वह आने वाले 70 वर्ष और उससे भी आगे भी चलता रहेगा।
डा. राकेश मोहन ने सभी विशिष्ट अतिथियों को धन्यवाद दिया।
विनय प्रकाश श्रीवास्तव
प्रबंधक
प्रेस प्रकाशनी : 2005-2006/1186
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