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क्‍यूई-II और भारत में विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह - क्‍या कोई संबंध है? भारतीय रिज़र्व बैंक वर्किंग पेपर

30 नवंबर 2011

क्‍यूई-II और भारत में विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह - क्‍या कोई संबंध है?
भारतीय रिज़र्व बैंक वर्किंग पेपर

भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज क्‍यूई-II और भारत में विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह - क्‍या कोई संबंध है? शीर्षक अपनी श्रृंखला का 19वॉं वर्किंग पेपर जारी किया।  भारतीय रिज़र्व बैंक की वर्किंग पेपर श्रृंखला रिज़र्व बैंक के स्‍टाफ को अपने अनुसंधान के प्रस्‍तुतीकरण के साथ-साथ सूचित अनुसंधानकर्ताओं से प्रतिसूचना प्राप्‍त करने के लिए इस वर्ष अप्रैल में लागू किया गया था। वर्किंग पेपर श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित पेपर रिज़र्व बैंक के सामयिक संदर्भ के मुद्दे और चुनौतियों पर तीव्र विश्‍लेषणात्‍मक अनुसंधान पेपर है। सामयिक पेपरों के विपरीत रिज़र्व बैंक के अन्‍य अनुसंधान प्रकाशन जो विशिष्‍ट आवधिकता के साथ प्रकाशित किए जाते हैं, वर्किंग पेपर जब और जैसे तैयार होते हैं तथा केवल अंकीकृत स्‍वरूप में ही प्रकाशित किए जाते हैं। वर्किंग पेपर में प्रकाशित विचार लेखकों के हैं और वे भारतीय रिज़र्व बैंक के विचारों का प्रतिनिधित्‍व नहीं करते हैं।

हाल के वैश्विक वित्तीय संकट (जीएफसी) ने सारे विश्‍व के कई देशों में उत्‍पादन में गिरावट लाया। वैश्विक वित्तीय संकट की प्रतिक्रिया में विस्‍तारवादी राजकोषीय और सहायक मौद्रिक नीतियॉं लागू की गईं। लगभग शून्‍य ब्‍याज दरों का सामना करते हुए कुछ विकसित अर्थव्‍यवस्‍थाओं ने अर्थव्‍यवस्‍था की सहायता के लिए भारी मात्रा में सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद की। नवंबर 2008 और मार्च 2010 के बीच फेड़रल अमरीका में मुद्रास्‍फीति के प्रति भारी नकारात्‍मक जोखिम बने रहे। तेजी से सुधार लाने और अपस्‍फीति से लड़ने के प्रयास में अमरीकी संघ ने 3 नवंबर 2010 को आस्ति खरीद के अपने दूसरे दौर की घोषणा की। इसे व्‍यापक रूप से परिमाणात्‍मक, सहजता-II (क्‍यूई-II) कहा गया। इन नीतियों से उत्‍पन्‍न बढ़ी हुई चलनिधि को उभरती हुई बाज़ार अर्थव्‍यवस्‍थाओं के प्रति बढ़ते हुए पूँजी प्रवाहों को शक्ति प्रदान करने के संदेह से देखा गया। इसी संदर्भ में यह कहा गया है कि यह पेपर ''पहले और बाद'' के ढॉंचे में अमरीका में परिमाणात्‍मक सहजता- II की पृष्‍ठभूमि के विपरीत मार्च 2010 और जून 2011 के बीच दैनिक ऑंकड़ों का उपयोग करते हुए भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह के ढॉंचे की परीक्षा करता है। विशेष रूप में यह पेपर क्‍यूई-II की घोषणा के बाद भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाहों के व्‍यवहार में परिवर्तन की जॉंच करता है।

प्रारंभिक अनुभवजन्‍य प्रमाण यह प्रस्‍तावित करते हैं कि भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह क्‍यूई-II की घोषणा के बाद नहीं बढ़ा है। रोचक रूप से भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह अमरीकी फेडरल अध्‍यक्ष बर्नांके जैक्‍सन होल्‍ड के उस भाषण के बाद बढ़ा हुआ दिखाई देता है जिसमें उन्‍होंने यह उल्‍लेख किया था कि क्‍यूई मुद्रास्‍फीति के प्रति नकारात्‍मक जोखिमों पर कार्रवाई के लिए उपलब्‍ध कई विकल्‍पों में एक था। यह निष्‍कर्ष कि क्‍यूई-II की घोषणा के बाद विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह नहीं बढ़ा है, इस बात का संकेत कर सकता है कि बाज़ार सहभागी क्‍यूई-II की आशा कर रहे थे और यह उनके व्‍यवहार में शामिल हो गया था। वस्‍तुत: परिणाम यह प्रस्‍तावित करते हैं कि क्‍यूई-II की घोषणा के बाद विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाह उल्‍लेखनीय रूप से गिरे हैं। 3 नवंबर 2010 के बाद विदेशी संस्‍थागत निवेश अंतर्वाहों में गिरावट उन कारकों के माध्‍यम से व्‍यक्‍त की गई है जो नकारात्‍मक रूप से वैश्विक और घरेलू कारकों का उपयोग करते हुए भारत में शेयर बाज़ार प्रतिलाभों को प्रभावित कर रहे थे। इनमें यूरो क्षेत्र में वैश्विक ऋण समस्‍याएं, उत्‍तरी और दक्षिण कोरिया के बीच तथा एमईएनए क्षेत्र में राजनीतिक तनाव, भारत में उच्‍चतर मुद्रास्‍फीति और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा नीति दरों में बढ़ोतरी शामिल है।

अजीत प्रसाद
सहायक महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी : 2011-2012/849

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