भारतीय रिज़र्व बैंक ने चलनिधि प्रबंधन और ऋण प्रवाह को सुधारने के लिए और अधिक उपाय घोषित किए - आरबीआई - Reserve Bank of India
भारतीय रिज़र्व बैंक ने चलनिधि प्रबंधन और ऋण प्रवाह को सुधारने के लिए और अधिक उपाय घोषित किए
15 नवंबर 2008
भारतीय रिज़र्व बैंक ने चलनिधि प्रबंधन और ऋण प्रवाह को भारतीय रिज़र्व बैंक ने 24 अक्तूबर 2008 को मौद्रिक नीति की अपनी मध्यावधि समीक्षा में यह दर्शाया था कि वह चलनिधि और मौद्रिक परिस्थिति की नज़दीकी से और निरंतर आधार पर निगरानी करेगा और भारतीय वित्तीय बाज़ारों पर वैश्विक गतिविधियों के प्रभाव पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करेगा। रिज़र्व बैंक ने यह भी दर्शाया है कि मौद्रिक नीति को लागू करने की चुनौती वित्तीय स्थिरता को बचाए रखना, मूल्य स्थिरता को बनाए रखना और विकास की गति को बनाए रखने के बीच इष्टतम संतुलन रखना है। उभरती वैश्विक गतिविधियों की प्रतिक्रिया में रिज़र्व बैंक ने सितंबर 2008 के मध्य से कई उपाय किए है। इन उपायों का उद्देश्य विकास की गति को बनाए रखने के लिए ऋण गुणवत्ता को बनाए रखते हुए घरेलू और विदेशी चलनिधि को बढ़ाना और उत्पादक प्रयोजनों के लिए बैंकों को उधार देना जारी रखना है। रिज़र्व बैंक द्वारा किए गए प्रमुख उपायों का सरांश निम्नानुसार है - मौद्रिक उपाय
रुपया चलनिधि
विदेशी मुद्रा चलनिधि
वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों का घरेलू मुद्रा, विदेशी मुद्रा और ऋण बाज़ारों पर लहरदार प्रभाव के साथ अनिश्चितता और अव्यवस्थित रहना जारी है। यह दर्शाया जा रहा है कि वैश्विक मंदी का घरेलू अर्थव्यवस्था पर खास तौर से मध्यम और लघु उद्यम क्षेत्र और निर्यात उन्मुखी क्षेत्रों की माँग परिस्थितियों पर मूल रूप से प्रत्याशित प्रभाव से भी अधिक गहरा प्रभाव पड़ रहा है। इन गतिविधियों के संदर्भ में रुपया और विदेशी चलनिधि को और आगे बढ़ाना, ऋण आपूर्ति व्यवस्था को मज़बूत बनाना और ऋण सुपुदर्गी को सुधारना, विकास की गति को बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। उन क्षेत्रों पर जो रोज़गार और निर्यात को उल्लेखनीय रूप से योगदान दे रहे हैं की व्यवहार्यता को बनाए रखने पर खास ध्यान देना आवश्यक है। उभरती गतिविधियों की और अधिक समीक्षा करने पर रिज़र्व बैंक ने निम्नलिखित उपायों को लागू करने का निर्णय लिया है रुपया चलनिधि बढ़ाना (i) पारस्परिक निधियों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की चलनिधि आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयोजन से लागू की गयी विशेष नियत दर मीयादी रिपो सुविधा को मार्च 2009 के अंत तक जारी रखा जाएगा। बैंक की सुविधा का लाभ वृद्धियुक्त अथवा पुनर्निर्घारणीय आधार पर अपनी निवल माँग और मीयादी देयताओं(एनडीटीएल) की 1.5 प्रतिशत की सीमा तक अपनी पात्रता के भीतर बैंक की सुविधा का लाभ ले सकते हैं। विदेशी मुद्रा चलनिधि बढ़ाना विदेशा मुद्रा अनिवासी (बैंक) डएफसीएनआर(बी) योजना (ii)वर्तमान में, विदेशा मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमाराशियों पर ब्याज दर की सीमा संबंधित मुद्रा/तदनुरूपी परिपक्वताओं के लिए लिबोर/स्वैप दर से 25 आधार बिंदु अधिक पर निर्धारित की गई है। मौजूदा बाज़ार परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि एफसीएनआर(बी) जमाराशियों पर ब्याज दर की सीमा को तत्काल प्रभाव से और आगे 75 आधार बिंदुओं से अर्थात् लिबोर/स्वैप दर से 100 आधार बिंदु अधिक से बढ़ाया जाए। अनिवासी (बाह्य) रुपया खाता डएनआर(ई)आरए (iii)वर्तमान में, अनिवासी (बाह्य) रुपया खाता डएनआर(ई)आरए पर ब्याज दर की सीमा तदनुरूपी परिपक्वताओं के अमरीकी डॉलर के लिए लिबोर/स्वैप दर से 100 आधार बिंदु अधिक पर निर्धारित की गयी है। अब यह निर्णय लिया गया है कि अनिवासी (बाह्य) रुपया खाता डएनआर(ई)आरए जमाराशियों पर ब्याज दर की सीमा को तत्काल प्रभाव से और आगे 75 आधार बिंदुओं अर्थात् लिबोर/स्वैप दर से 175 आधार बिंदु अधिक से बढ़ाया जाए। आवासीय वित्त कंपनियाँ (iv)यह निर्णय लिया गया है कि अस्थायी उपाय के रूप में राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी) के साथ पंजीकृत आवासीय वित्त कंपनियों को अनुमोदन मार्ग के अंतर्गत अल्पावधि विदेशी मुद्रा उधार उगाहने की अनुमति दी जाए बशर्तें वे राष्ट्रीय आवास बैंक द्वारा दिए गए विवेकपूर्ण मानदण्ड़ों का अनुपालन करते है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी अलग से अधिसूचित की जा रही है।विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बाँड (एफसीसीबी) पुर्नखरीद/पूर्व-भुगतान (v)वैश्विक गतिविधियों के मद्देनज़र भारतीय कंपनियों द्वारा जारी विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बाँड वर्तमान में मितीकाटे पर व्यापार कर रहे है। यह संबंधित कंपनी तथा अर्थ व्यवस्था के लिए लाभदायी है यदि कंनियां एफसीसीबी की चालू मितीकाटा दरों पर पुर्नखरीद करते है। इन संभाव्य लाभों को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा भारतीय कंपनियों द्वारा अपनी एफसीसीबी की समय-पूर्व पुर्नखरीद के प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा। इस पुर्नखरीद का वित्तपोषण भारत अथवा विदेश में धारित कंपनी की विदेशी मुद्रा स्त्राटतों से किया जाना चाहिए और/अथवा बाह्य वाणिज्यिक उधारों के लिए वर्तमान मादण्ड़ो के अनुरूप नए बाह्य वाणिज्यिक उधार (इसीबी) के उगाहा जाना चाहिए। इस संबंध में प्रस्तावों को अनुमोदन मार्ग के अंतर्गत माना जाएगा। संबंधित परिपक्वता के लिए वर्तमान संपूर्ण लागत पर एफसीसीबी को बढ़ाने की भी अनुमति दी जाएगी। ऋण सुपुर्दगी (vi)बाह्य माँग कमज़ोर होने के कारण निर्यातकों को हो रही समस्याओं को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि पोतलदान पूर्व रुपया निर्यात ऋण के प्रथम चरण की पात्रता की अवधि को 180 दिवस से 270 दिवस तक तत्काल प्रभाव से आगे बढ़ाया जाए। वर्तमान में यह बेंच-मार्क मूल उधार दर (बीपीएलआर) से 2.5 प्रतिशत बिंदु कम की रियायती ब्याज दर की सीमा पर उपलब्ध है। (vii)वर्तमान में, निर्यात ऋण पुर्नवित्त (ईसीआर) सीमा द्वितीय पूर्ववर्ती पखवाड़े के अंत पर पुर्नवित्त के लिए पात्र बकाया रुपया निर्यात ऋण के 15 प्रतिशत पर निर्धारित की गई है। वर्तमान में ईसीआर की समग्र सीमा लगभग 9,500 करोड़ रुपए है। अब यह निर्णय लिया गया है कि ईसीआर की पात्रता सीमा को अनुसूचित बैंकों (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर) के लिए पुर्नवित्त के लिए पात्र बकाया निर्यात ऋण का 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए। इससे बैंकों को लगभग 22,000 करोड़ रुपए तक की राशि की अतिरिक्त चलनिधि सहायता उपलब्ध हो जाएगी। ईसीआर पर लागू ब्याज दर की सुविधा चलनिधि समायोजन सुविधा के अंतर्गत वर्तमान रिपो दर जो वर्तमान में 7.5 प्रतिशत है लागू होना जारी रहेगा। (viii)सूक्ष्म और लघु उद्यमों और आवासीय क्षेत्रों के रोज़गार उन्मुख क्षेत्रों में विकास की गति को सुनिश्चित करने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि अनुसूचित वाणिज्य बैंकों से तत्काल अग्रिम में राशि आबंटित की जाए। यह राशि मार्च 2009 में प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार में बैंकों की प्रत्याशित कमी के बदले सीडबी और एनएचबी को क्रमशः 2000 करोड़ रुपए और 1000 करोड़ रुपए का योगदान दिया जाए। सीडबी और एनएचबी को अब किए गए आबंटन का मार्च 2009 की समाप्ति पर प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार के लिए बैंकों की लक्ष्य/उप-लक्ष्यों के वास्तविक प्राप्ति से समायोजन किया जाएगा। बैंक-समूहवार आबंटनों को अलग से अधिसूचित किया जा रहा है। (iX)चलनिधि को और अधिक सुगम बनाने और बैंकों को चलनिधि प्रबंधन में लचीलापन उपलब्ध कराने के लिए रिज़र्व बैंक ने 1 नवंबर 2008 को भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 1934 की धारा 17(3ख) के अंतर्गत एक विशेष पुनर्वित सुविधा लागू की। इस सुविधा के अंतर्गत सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको को छोड़कर) को रिज़र्व बैंक से 24 अक्तूबर 2008 तक प्रत्येक बैंक की अपनी एनडीटीएल के 1.0 प्रतिशत के समतुल्य तथा अधिकतम 90 दिनों की अवधि तक चलनिधि समायोजन सुविधा रिपो दर पर पुनर्वित उपलब्ध कराया जाएगा। बैंकों को इस सुविधा का प्रयोग सूक्ष्म और लघु उद्यमों को वित्त उपलब्ध कराने के लिए करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। (X)प्रति - चक्रिय विवेकपूर्ण उपाय के रूप में 20 लाख रुपये के अधिक राशि वाले आवासीय ऋण के लिए मानक अग्रिमों पर सामान्य प्रावधानीकरण की आवश्यकता को प्रगतिशील रूप से 0.25 प्रतिशत से 1.0 प्रतिशत तक बढ़ाया गया। जबकि बकाया क्रेडिट कार्ड प्राप्तियां, पूँजी बाज़ार निवेश के रूप में अर्हता प्राप्त ऋण और अग्रिम तथा जमाराशियां स्वीकार न करनेवाली प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां सहित वाणिज्यिक संपदा क्षेत्र, व्यक्तिगत ऋण में मानक अग्रिमों को प्रगतिशील रूप से 0.25 प्रतिशत से 2.0 प्रतिशत किया गया। मौजूदा समष्टि अर्थ-व्यवस्था, मौद्रिक और ऋण परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि गतिशील प्रावधानीकरण की प्रथा को बनाए रखते हुए मानक आस्तियों के सभी प्रकारों के लिए प्रावधानीकरण आवश्यकताएं 0.40 प्रतिशत पर एक-समान रूप से घटायी जाएगी। इसमें कृषि और लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के प्रत्यक्ष अग्रिम के मामले शामिल नहीं होंगे जिसमें पहले की तरह 0.25 प्रतिशत का प्रावधानीकरण जारी रहेगा। संशोधित मानदण्ड भविष्यलक्षी प्रभाव से लागू होंगे किंतु वर्तमान में धारित प्रावधान का प्रत्यावर्तन नहीं किया जाना चाहिए। (Xi)इसी प्रकार, कतिपय क्षेत्रों में बैंकों के निवेशों पर जोखिम भारिता जिसे प्रति चक्रियता से बढ़ाया गया था, को भी मौजूदा समष्टि अर्थव्यवस्था, मौद्रिक और ऋण परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए घटाते हुए संशोधित किया गया है। कंपनियों पर सभी गैर-दर वाले दावों पर पहले निर्धारित ऐसे निवेशों के लिए 150 प्रतिशत की जोखिम भारिता के बदले 100 प्रतिशत की एक समान जोखिम भारिता लागू होगी। यह 1 अप्रैल 2008 से 50 करोड़ रुपये से अधिक निवेशों के लिए और 1 अप्रैल 2009 से 10 करोड़ रुपये से अधिक निवेशों के लिए लागू था। वाणिज्यिक संपदा द्वारा प्रतिभूति वाले दावों पर पहले के 150 प्रतिशत की जोखिम भारिता के बदले 100 प्रतिशत की जोखिम भारिता लागू होगी। दर वाली और गैर-दर वाली जमाराशियां स्वीकार न करनेवाली प्रणालीगतरूप से महत्वपूर्ण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी - एनडी - एसआइ) पर दावों पर एक-समान रूप से 100 प्रतिशत जोखिम भारिता लागू होगी। आस्तियों को वित्तपोषित करने वाली कंपनियों के संबंध में दावों पर जोखिम भारिता में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इन पर आस्तियों को वित्तपोषित करने वाली कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग लागू होना जारी रहेगा। केवल वे दावे जो नए पूँजी पर्याप्तता ढाँचे के अंतर्गत 150 प्रतिशत की जोखिम भारिता वाले है को 100 प्रतिशत के स्तर तक घटाया जाएगा। रिज़र्व बैंक वैश्विक और घरेलू वित्तीय बाज़ारों की गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रखेगा और त्वरित उपयुक्त प्रभावी कार्रवाई करेगा। जी.रघुराज प्रेस प्रकाशनी : 2008-2009/697 |