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आरबीआई बुलेटिन – जनवरी 2025

आज, भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने मासिक बुलेटिन का जनवरी 2025 अंक जारी किया। बुलेटिन में सात आलेख और वर्तमान सांख्यिकी शामिल हैं। बैंकिंग की प्रवृत्ति और प्रगति रिपोर्ट 2023-24 तथा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट दिसंबर 2024, जनवरी 2025 के  इस बुलेटिन के अनुपूरक हैं।
सात आलेख इस प्रकार हैं: I. अर्थव्यवस्था की स्थिति; II. मौद्रिक नीति संचार को मापना: भारतीय अनुभव; III. विदेशी मुद्रा मध्यक्षेप: भारतीय अनुभव में प्रभावकारिता और समझौताकारी समन्वयन; IV. भारत 2.0 के लिए संतुलनकारी विनिमय दरों का अनुमान लगाने के लिए दृष्टिकोणों का एक समूह ; V. भू-राजनीतिक जोखिम और भारत में व्यापार और पूंजी प्रवाह; VI. भारतीय अर्थव्यवस्था के वित्तीय स्टॉक और निधियों का प्रवाह 2022-23; और VII. राजकोषीय-मुद्रास्फीति संबंध: क्या कोई फीडबैक लूप है?

I. अर्थव्यवस्था की स्थिति

 वर्ष 2025 के लिए आर्थिक दृष्टिकोण विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न है, जिसमें अमेरिका में गति में कुछ कमी; यूरोप और जापान में कमजोर से लेकर मामूली सुधार; उभरते और विकासशील देशों में अधिक मध्यम संवृद्धि प्रोफ़ाइल के साथ-साथ उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के सापेक्ष अधिक क्रमिक अवस्फीति। भारत में, वर्ष 2024-25 की दूसरी छमाही में आर्थिक गतिविधि के उच्च आवृत्ति संकेतकों में अनुकूल तेज़ी है, जो एनएसओ के वार्षिक प्रथम अग्रिम अनुमानों में इस अवधि के लिए वास्तविक जीडीपी संवृद्धि में निहित वृद्धि को दर्शाता है। दिसंबर में लगातार दूसरे महीने हेडलाइन मुद्रास्फीति में कमी आई, तथापि खाद्य मुद्रास्फीति में स्थिरता दूसरे दौर के प्रभावों की सावधानीपूर्वक निगरानी की मांग करती है।

II. मौद्रिक नीति संचार को मापना: भारतीय अनुभव

माइकल देवब्रत पात्र, श्वेता कुमारी और इंद्रनील भट्टाचार्य द्वारा

यह आलेख प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (एनएलपी) तकनीकों का उपयोग करके मौद्रिक नीति घोषणा के दिन गवर्नर के वक्तव्य और उसके बाद की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जांच करता है। यह प्रत्याशाओं को, विशेषकर संकट की स्थिति के दौरान, प्रबंधित करने में संचार की भूमिका पर प्रकाश डालता है।  

मुख्य बातें:

  • नीति संचार कार्यनीति उभरती आर्थिक स्थितियों और अनिश्चितता के प्रत्युत्तर में विकसित हुई है, जैसा कि गवर्नर के वक्तव्यों में चर्चा किए गए विभिन्न विषयों पर बदलते जोर से परिलक्षित होता है।
  • प्रेस कॉन्फ्रेंस नीतिगत निर्णयों के स्पष्टीकरण और सुदृढ़ीकरण के लिए एक प्रमुख संचार चैनल के रूप में कार्य करती है।
  • चयनित और जोर देने वाले शब्दों के साथ सावधानीपूर्वक तैयार किए गए गवर्नर के वक्तव्यों ने प्रतिकूल और अनिश्चित अवधि के दौरान भारतीय वित्तीय बाजारों में विश्वास उत्पन्न किया है।

III. विदेशी मुद्रा मध्यक्षेप: भारतीय अनुभव में प्रभावकारिता और समझौताकारी समन्वयन

माइकल देवब्रत पात्र, सुनील कुमार, जॉइस जॉन और अमरेंद्र आचार्य द्वारा

 यह आलेख भारत में विनिमय दर की अस्थिरता को नियंत्रित करने में भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा किए गए विदेशी मुद्रा मध्यक्षेप की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करता है।

मुख्य बातें:

  • वैश्विक प्रभाव- विस्तार से प्रेरित पोर्टफोलियो प्रवाह की अस्थिरता, भारत में विनिमय दर की अस्थिरता का मुख्य स्रोत है।
  • विदेशी मुद्रा मध्यक्षेप, स्पॉट और वायदा दोनों, खरीद और बिक्री के सममित प्रभावों के साथ पूंजी प्रवाह की अस्थिरता का प्रभावी ढंग से सामना करते हैं।
  • विनिमय दर अस्थिरता पर सकल स्पॉट मध्यक्षेप का प्रभाव, सीमा प्रभावों के अस्तित्व को इंगित करता है, जो हवा के विरुद्ध झुकाव के रूप में रिज़र्व बैंक की भूमिका को स्पष्ट करता है।

IV. भारत 2.0 के लिए संतुलनकारी विनिमय दरों का अनुमान लगाने के लिए दृष्टिकोणों का एक समूह

माइकल देवब्रत पात्र, हरेंद्र बेहरा, धीरेंद्र गजभिए, सुजाता कुंडू और राजस सरॉय द्वारा

संतुलनकारी विनिमय दर मॉडल, आर्थिक बुनियादी बातों के आधार पर विनिमय दर के "उचित मूल्य" का आकलन करने के लिए मार्गदर्शक रूपरेखा प्रदान करते हैं। यह पेपर पूंजी संवर्धित संतुलन विनिमय दर (सीएचईईआर), वांछित संतुलन विनिमय दर (डीईईआर) और प्राकृतिक वास्तविक विनिमय दर (एनएटीआरईएक्स) दृष्टिकोणों को शामिल करने के लिए संतुलनकारी विनिमय दरों के समूह का विस्तार करता है। यह मूल्य अंतर, ब्याज दर अंतर, सामाजिक मितव्ययिता, उत्पादकता और चालू खाता शेष की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करते हुए विनिमय दर गतिकी को समझने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है।

मुख्य बातें:

  • संतुलनकारी विनिमय दरें, अंतर्निहित समझौताकारी समन्वयन को स्वीकार करते हुए, मध्यम से दीर्घ अवधि में दिए गए बुनियादी सिद्धांतों के साथ स्थिरता को दर्शाती हैं।
  • संतुलनकारी विनिमय दर की सही अवधारणा पर साहित्य में कोई आम सहमति नहीं है।
  • इस पेपर और इसके पूर्व भाग में चर्चित और अनुमानित प्रत्येक अवधारणा एक विशेष नीतिगत प्रश्न से मेल खाती है।
  • अनुभवजन्य परिणाम दर्शाते हैं कि वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) व्यापक रूप से दीर्घावधि संतुलनकारी स्तर के अनुरूप चली है, जैसा कि समष्टि आर्थिक बुनियादी सिद्धांतों द्वारा निर्धारित किया गया है।
  • ये अनुमान प्रमुख मापदंडों, मॉडलिंग ढांचे और उनके विकल्पों के प्रति संवेदनशील हैं। विनिमय दर के असंतुलन का कोई भी आकलन अनुभवजन्य विश्लेषण द्वारा सूचित किया जाना चाहिए।

V. भू-राजनीतिक जोखिम तथा भारत में व्यापार और पूंजी प्रवाह

शेषाद्रि बनर्जी, हरेंद्र कुमार बेहरा, हर्षिता केशान और माइकल देवब्रत पात्र द्वारा

वैश्विक तनाव के तीव्र होने के दौर में भू-राजनीतिक जोखिम (जीपीआर) के आर्थिक प्रभावों को समझना महत्वपूर्ण है। यह आलेख भारत के व्यापार और वित्तीय गतिकी को आकार देने में भू-राजनीतिक जोखिम द्वारा निभाई गई व्यापक भूमिका की जांच करता है।

मुख्य बातें:

  • बहुभिन्नरूपी समय शृंखला मॉडलों का उपयोग करते हुए, अध्ययन में पाया गया है कि भारत के लिए भू-राजनीतिक जोखिम सूचकांक (जीपीआरआई) में एक-मानक विचलन का आघात, सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में व्यापार और पूंजी प्रवाह अनुपात में 0.9 और 0.2 प्रतिशत अंकों की गिरावट का कारण बनता है, जबकि विश्व के लिए जीपीआरआई में ऐसा ही आघात, व्यापार और पूंजी प्रवाह में क्रमशः 1.0 और 0.3 प्रतिशत अंकों की कमी लाता है, जिसमें संकुचन के समय और अवधि में उल्लेखनीय अंतर होता है।
  • वित्तीय चैनल की तुलना में व्यापार चैनल की सापेक्षिक प्रधानता को देखते हुए, इसके निष्कर्ष जीपीआर आघातों को कम करने के लिए कार्यनीतिक और लक्षित हस्तक्षेपों के साथ अपनी नीतिगत प्रतिक्रिया को तैयार करने की भारत की जरूरतों को रेखांकित करते हैं।

VI. भारतीय अर्थव्यवस्था के वित्तीय स्टॉक और निधियों का प्रवाह 2022-2

सूरज एस, इसु ठाकुर, मौसमी प्रियदर्शनी और अभिषेक नेहरा द्वारा

यह आलेख 2022-23 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी संस्थागत क्षेत्रों में वित्तीय स्टॉक और प्रवाह (एफएसएफ) में अंतर्निहित रुझानों को फ्रम-हूम-टू-हूम (एफडब्ल्यूटीडब्ल्यू) के आधार पर प्रस्तुत करता है। वित्तीय प्रवाह का विश्लेषण, उभरते हुए समष्टि आर्थिक रुझानों के बीच निधि के स्रोतों और उपयोगों पर नज़र रखकर विभिन्न क्षेत्रों और वास्तविक आर्थिक गतिविधियों में अंतर्संबंधों की जानकारी प्रदान करता है। लेख के साथ 2011-12 से 2022-23 की अवधि के लिए गैर-समेकित विवरण भी जारी किए जा रहे हैं।

मुख्य बातें:

  • घरेलू क्षेत्रों की वित्तीय आस्तियों में 2022-23 में 9.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि 2021-22 में यह 9.9 प्रतिशत थी, जबकि देयताओं में पिछले वर्ष की 10.2 प्रतिशत की तुलना में 10.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • घरेलू अर्थव्यवस्था 2022-23 में निवल उधारकर्ता बनी रही, जिसका मुख्य कारण घरेलू क्षेत्र से वित्तपोषण में कमी है।
  • पारिवारिक इकाई और वित्तीय निगम अधिशेष क्षेत्र बने रहे, तथा सामान्य सरकार और गैर-वित्तीय निगमों के घाटे को समायोजित करते रहे।
  • अन्य डिपॉजिटरी निगमों की वित्तीय आस्तियों और देयताओं में 2014-15 के बाद से सबसे अधिक वृद्धि हुई, क्योंकि परिवारों और कारोबारों की ओर से ऋण की मांग में तेजी बनी रही।
  • अन्य डिपोजिटरी निगमों से सामान्य सरकार की ओर प्रवाह में वृद्धि, उच्च सार्वजनिक उधार आवश्यकताओं को दर्शाती है।
  • मार्च 2023 के अंत में मुद्रा और जमा, ऋण और अग्रिम, और ऋण प्रतिभूतियों का कुल वित्तीय आस्तियों और देयताओं में लगभग दो-तिहाई हिस्सा होगा।

VII. राजकोषीय-मुद्रास्फीति संबंध: क्या कोई फीडबैक लूप है?

हर्षिता केशन, गरिमा वही और कृष्ण मोहन कुशवाहा द्वारा

महामारी के बाद के लंबे समय तक उच्च वैश्विक मुद्रास्फीति और सरकारी ऋण अनुपात में उछाल के अनुभव के संदर्भ में, यह लेख पैनल वेक्टर ऑटोरिग्रेशन (PVAR) के व्यापक रूपरेखा में राजकोषीय-मुद्रास्फीति संबंध की जांच करता है।

मुख्य बातें:

  • अध्ययन से पता चलता है कि उच्च मुद्रास्फीति अस्थायी रूप से ऋण के बोझ को कम कर सकती है, लेकिन यह प्रभाव दीर्घकालिक राजकोषीय चुनौतियों का समाधान करने के लिए न तो स्थायी है और न ही पर्याप्त है।  
  • निष्कर्ष उच्च सार्वजनिक ऋण के मुद्रास्फीतिकारी प्रभावों को रेखांकित करते हैं, तथा राजकोषीय समेकन की आवश्यकता पर बल देते हैं।

  बुलेटिन के आलेखों में व्यक्त विचार इनके लेखकों के हैं और यह भारतीय रिज़र्व बैंक के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

(पुनीत पंचोली)  
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2024-2025/1949

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