भारतीय रिज़र्व बैंक सामयिक पेपर खंड 33 – सं. 1 और 2: 2012 - आरबीआई - Reserve Bank of India
भारतीय रिज़र्व बैंक सामयिक पेपर खंड 33 – सं. 1 और 2: 2012
30 जून 2014 भारतीय रिज़र्व बैंक सामयिक पेपर खंड 33 – सं. 1 और 2: 2012 भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज अपने सामयिक पेपर का खंड 33 (सं. 1 और 2) जारी किया। इस खंड के साथ सामयिक पेपरों के वर्ष में दो अंक होंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक के सामयिक पेपर रिज़र्व बैंक की अनुसंधान पत्रिका है और इसमें इसके स्टाफ का योगदान होता है तथा यह लेखकों के विचार दर्शाती है। इस अंक में निम्नलिखित आलेख, विशेष टिप्पणियां और एक पुस्तक की समीक्षा है। ऋण का प्रारंभिक स्तर और सार्वजनिक ऋण की संधारणीयता: भारतीय महत्व बलबीर कौर और अत्री मुखर्जी का पेपर “ऋण का प्रारंभिक स्तर और सार्वजनिक ऋण की संधारणीयता: भारतीय महत्व” भारत में सार्वजनिक ऋण की संधारणीयता का आकलन करता है। यह भारतीय संदर्भ में सार्वजनिक ऋण और विकास के बीच संबंध की भी जांच करता है। अंतर-सामयिक बजट अवरोध और वर्ष 1980-81 से 2012-13 की अवधि के लिए सामान्य सरकारी स्तर पर राजकोषीय नीतिगत प्रतिक्रिया कार्य के अनुभवजन्य आकलन पर आधारित संधारणीयता विश्लेषण दर्शाता है कि भारत में ऋण स्थिति दीर्घावधि में संधारणीय है। अनुभवजन्य परिणाम यह भी दर्शाते हैं कि भारत में सार्वजनिक ऋण और वृद्धि के बीच सांख्यिकी रूप से महत्वपूर्ण अरैखिक संबंध है जो उच्च स्तरों पर आर्थिक वृद्धि पर सार्वजनिक ऋण के नकारात्मक प्रभाव को दर्शाता है। भारत का सामान्य सरकारी ऋण-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात 61 प्रतिशत है, इससे अधिक अनुपात पर ऋण और वृद्धि के बीच विपरीत संबंध देखा जाता है। यह प्रारंभिक स्तर मार्च 2013 के अंत में जीडीपी के 66 प्रतिशत के ऋण के वास्तविक स्तर से कम है। यह प्रतिकूल ऋण गतिशीलता से सुरक्षा करने के लिए विश्वसनीय राजकोषीय समेकन पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की मांग करता है, वृद्धि में हाल की कमी को देखते हुए ब्याज दर-वृद्धि अंतर कम अनुकूल हो सकता है। तत्काल कारोबार स्थिति सूचक: भारत के लिए सांख्यिकी रूप से सर्वोत्कृष्ट ढांचा दिपांकर बिश्वास, निवेदिता बैनर्जी और अभिमान दास का पेपर “तत्काल कारोबार स्थिति सूचक: भारत के लिए सांख्यिकी रूप से सर्वोत्कृष्ट ढांचा” भारत के लिए तत्काल कारोबार स्थिति सूचक सृजित करने के लिए एक ढांचे का प्रस्ताव करता है। चार चयनित सूचकों अर्थात दैनिक प्रतिफल वक्र अवधि प्रीमियम, पाक्षिक संकुचित मुद्रा, मासिक औद्योगिक उत्पादन सूचक और भिन्न-भिन्न आवर्तियों पर मापित तिमाही गैर-कृषि जीडीपी पर आधारित यह पेपर निरंतर रूप से उभरते राज्यों से संकेत प्राप्त करने के लिए गतिशील कारक मॉडल ढांचे का अनुसरण करते हुए भारत के लिए तत्काल कारोबार स्थिति सूचक का निर्माण करता है। राज्य-स्थल प्रतिनिधित्व से संकेतक निष्कर्ष और संभावना कार्य के मूल्यांकन के लिए कलमान फिल्टर रूटिन का प्रयोग किया जाता है। अनुभवजन्य परिणाम दर्शाते हैं कि यह सम्पाती सूचक उचित रूप से समग्र आर्थिक गतिविधि का पता लगाता है। असक्षम बाजारों के लिए आस्ति मूल्यनिर्धारण मॉडल: भारतीय बाजार से अनुभवजन्य साक्ष्य “असक्षम बाजारों के लिए आस्ति मूल्यनिर्धारण मॉडल : भारतीय बाजार से अनुभवजन्य साक्ष्य”नामक पेपर में देबासिश मजुमदार उन बाजारों के लिए एक उचित आस्ति मूल्यनिर्धारण पद्धति का अध्ययन करने और उसे प्रस्तावित करने का प्रयास करता है जो बाजार सभी अवधियों में समान रूप से सक्षम नहीं होते हैं। यह पेपर एक बदलाव का प्रस्ताव करता है जिसके द्वारा मूल बाजार कल्पित बाजार में बदल जाएगा जो तुलनात्मक रूप से सक्षम है। जनवरी 2003 से मार्च 2009 के दौरान इक्विटी बाजार में दैनिक पोर्टफोलियो प्रतिफल के विश्लेषण पर आधारित इस पेपर में लेखक सुझाव देता है कि मूल बाजार को कल्पित बाजार में बदलने की प्रक्रिया मूल आस्ति मूल्यनिर्धारण पद्धति की विशेषताओं में परिवर्तन किए बिना प्रायः आस्ति विवरणी आंकड़ों में पाई जाने वाली असाधारण स्थिरता और कम से कम आंशिक रूप से बड़े स्व सहसंबंधों को सरल बनाती है। लेखक के अनुसार परिणाम इसकी अधिक उपयुक्तता के मामले में पारंपरिक मॉडल के लिए श्रेष्ठ विकल्प है। ग्रामीण मजदूरी में हाल की प्रवृत्तियां: मुद्रास्फीतिकारी प्रभावों का विश्लेषण अपने पेपर “ग्रामीण मजदूरी में हाल की प्रवृत्तियां: मुद्रास्फीतिकारी प्रभावों का विश्लेषण” में जी.वी. नधानेएल ग्रामीण मजदूरी में हाल की वृद्धि और मुद्रास्फीति के लिए इसके प्रभाव का अध्ययन करने का प्रयास करता है। देशिक त्रुटि सुधार मॉडल का उपयोग करते हुए यह पेपर ग्रामीण भारत में मजदूरी-मूल्य स्पाइरल की उपस्थिति के लिए अनुभवजन्य परीक्षण करता है। इस पेपर में विश्लेषण प्रमुख निष्कर्ष दर्शाता हैः (i) वास्तविक मजदूरी में वृद्धि हाल की घटना रही है; (ii) वर्ष 2000-1007 की अवधि के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक मजदूरी स्थिर रही या उसमें गिरावट आई और मुद्रा मजदूरी मुख्यरूप से मुद्रास्फीति के प्रत्युत्तर में थी; (iii) वर्ष 2007 से मजदूरी में परिवर्तन मूल्यों में परिवर्तन द्वारा वर्णित नहीं हैं किंतु मजदूरी का मूल्यों पर प्रभाव पड़ता है क्योंकि वास्तविक मजदूरी में वृद्धि से उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है; (iv) मनरेगा मजदूरी अधिकांश श्रम आपूर्ति करने वाले राज्यों के लिए बाजार मजदूरी से अधिक रही जो यह दर्शाती है कि उन राज्यों में बाजार मजदूरी पर दवाब काफी हो सकता है; (v) मनरेगा का कवरेज़ नकदी अंतरण से उत्पन्न होने वाली मांग से दवाब डालने में तुलनात्मक रूप से कम है और (vi) हाल की अवधि में शिक्षा में बढ़ी हुई भागीदारी और महिला श्रमिकों के निष्कासन दोनों से कार्य बल भागीदारी दर में कमी आई तथा कृषि से श्रमिकों का स्थानांतरण श्रम बाजार कम करने और मजदूरी बढ़ाने में योगदान दे सका। पेपर यह भी निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि मजदूरी में हाल की वृद्धि का परिणाम राज्यों में ग्रामीण मजदूरी में अभिसरण के रूप में नहीं हुआ। क्या भारत का व्यापार संतुलन वास्तविक विनिमय दरों के लिए संवेदनशील है? द्विपक्षीय व्यापार आंकड़ों का विश्लेषण एक अन्य पेपर “क्या भारत का व्यापार संतुलन वास्तविक विनिमय दरों के लिए संवेदनशील है? द्विपक्षीय व्यापार आंकड़ों का विश्लेषण” में विवेक कुमार और विशाल मौर्य वास्तविक विनिमय दर का अपने व्यापार भागीदार देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापार संतुलन पर प्रभाव का विश्लेषण करते हैं। वर्ष 1991 से 2010 के वार्षिक आंकड़ों का उपयोग करते हुए यह पेपर 89 व्यापार भागीदार देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापार संतुलन पर द्विपक्षीय वास्तविक विनिमय दर के लंबे प्रभावों की जांच करता है। यह अध्ययन प्रतिगमन करने वालों के बीच एंडोजेनिटी की समस्या को दूर करने के लिए पूरी तरह से संशोधित सामान्य लीस्ट स्क्वेयर (एफएमओएलएस) पद्धति का उपयोग करता है जो एक गैर-पैरामीट्रिक विविध पैनल सह-समेकन तकनीक है। इसका परिणाम भारत के व्यापार संतुलन और वास्तविक विनिमय दर के बीच दीर्घावधि संबंध का अस्तित्व दर्शाता है। भारत के व्यापार संतुलन से दीर्घावधि में विनिमय दर के वास्तविक अवमूल्यन में सुधार होगा किंतु भारत की वास्तविक आय में बढ़ोतरी होने से इसमें गिरावट आएगी। विशेष टिप्पणियां सुनील कुमार और जय चंदर द्वारा लिखा गया नोट “मुद्रास्फीति सूचकांकित बांड और सार्वजनिक नीति : भारतीय संदर्भ में परीक्षण”सार्वजनिक ऋण प्रबंध, मौद्रिक नीति और बाह्य क्षेत्र प्रबंध के नजरिए से भारत में सार्वजनिक नीति के लिए मुद्रास्फीति सूचकांकित बांडों के संभावित लाभों की जांच करता है।सार्वजनिक ऋण प्रबंध दृष्टिकोण से लेखक पाते हैं कि आईआईबी कम से कम मुद्रास्फीति अनिश्चितता प्रीमियम की सीमा तक लागत बचत में सरकार को लाभ पहुंचा सकता है। इसके अतिरिक्त, चूंकि इन बांडों पर ब्याज के बड़े भुगतान वास्तविक मुद्रास्फीति से और इस प्रकार कर संग्रह से जुड़े हुए हैं; आईआईबी मुद्रास्फीति के कारण इन दो नकदी प्रवाहों के बीच बेमेल को कम करता है। कर संग्रह पर मुद्रास्फीति के प्रभाव पर विश्लेषण लगभग वन-टू-वन संबंध दर्शाता है जो सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण है। मौद्रिक नीति दृष्टिकोण से यह सुझाव है कि सरकार के ऋण पोर्टफोलियो में महत्वपूर्ण राशि के लिए आईआईबी मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाओं के बारे में सूचना उपलब्ध कराने के अतिरिक्त मूल्य स्थिरता के लिए सार्वजनिक नीतिगत विश्वसनीयता में सुधार कर सकता है। बाह्य क्षेत्र प्रबंध के संबंध में यह पाया जाता है कि अधिक मुद्रास्फीति से अधिक स्वर्ण आयात होता है। चूंकि आईआईबी मुद्रास्फीति बचाव के लिए एक वैकल्पिक आस्ति उपलब्ध कराएगा, ऋण प्रबंध रणनीति के भाग के रूप में इस लिखत का नियमित निर्गम निवेशकों को मुद्रास्फीति रक्षा के लिए स्वर्ण में निवेश से रोक सकता है जिससे स्वर्ण के आयात में कमी आ सकती है। एक दूसरे नोट “पिछले दो दशकों (1993-2013) में भारतीय विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता की प्रमुख घटनाएं: केंद्रीय बैंक की प्रतिक्रिया” में आनन्द प्रकाश वर्ष 1993 से 2013 की अवधि के दौरान भारतीय विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता के छह प्रमुख चरणों का विश्लेषण करता है, ये चरण बाह्य और देशी कारकों या दोनों द्वारा और अस्थिरता को काबू करने के लिए रिज़र्व बैंक की प्रतिक्रिया से उत्पन्न हुए। यह विश्लेषण दर्शाता है कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाद विनिमय दर अस्थिरता में काफी वृद्धि हुई जो विनिमय दर गतिविधियों पर अस्थिर पूंजी प्रवाहों के प्रभाव का उल्लेख करती है। भारत में अस्थिरता की विभिन्न घटनाओं के लिए नीतिगत प्रतिक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू बाजार हस्तक्षेप है जो वित्तीय स्थिरता के जोखिमों से निपटने के लिए मौद्रिक और प्रशासनिक उपायों से संयोजित है, भाषणों और प्रेस प्रकाशनियों के माध्यम से संचार में संपूरक या समानांतर उपाय किया गया है। केंद्रीय बैंक के साधनों में पर्याप्त साधनों की उपलब्धता भी संकट से बचने की एक आवश्यक स्थिति है। यह नोट निष्कर्ष निकालता है कि भारतीय बाह्य क्षेत्र में संरचनात्मक समस्याएं विशेषकर बड़ा व्यापार और चालू खाता घाटे का इस समस्या के लिए संधारणीय समाधान के सुलझाए जाने की आवश्यकता होगी। पुस्तक समीक्षा अवधेश के. शुक्ला ने रॉबर्ट मिनीकिन और केलविन लाउ द्वारा रचित तथा जॉन विले एंड सन्स सिंगापुर प्रा. लिमिटेड द्वारा प्रकाशित “दि ऑफशोर रेन्मिंबी: दि राइज ऑफ चाइनिज करेंसी एंड इट्स ग्लोबल फ्यूचर” की समीक्षा की। इस पुस्तक में लेखकों ने ऑफशोर रेन्मिंबी के विभिन्न पहलुओं जैसे इसकी सूक्ष्म संरचना, नीतिगत औचित्य, वैश्विक संबंध, ऑनशोर रेन्मिंबी पर प्रभाव आदि की समालोचना की है। इस पुस्तक में (i) ऑफशोर रेन्मिंबी अन्य करेंसियों से कैसे भिन्न है, (ii) अब तक ऑफशोर रेन्मिंबी की अंतर्राष्ट्रीय उपयोग से संबंधित प्रगति और इसकी भविष्य की क्या संभावनाओं के बारे में तथा (iii) ऑफशोर रेन्मिंबी बाजार में उपलब्ध निवेश और बचाव अवसरों के बारे में उत्तर देने का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में निष्कर्ष है कि आने वाले दशकों में चाइनिज रेन्मिंबी की वैश्विक वित्तीय प्रणाली में प्रभावी भूमिका होगी तथापि, इससे अमरीकी डॉलर गायब नहीं होगा जो महत्वपूर्ण आर्थिक बल बना रहेगा। संगीता दास प्रेस प्रकाशनी : 2013-2014/2534 |