हाल के वैश्विक संकट के बीच केंद्रीय बैंक का तुलनपत्र : भविष्य के मौद्रिक प्रबंध के मामले पर भारतीय रिज़र्व बैंक स्टाफ अध्ययन
13 अक्टूबर 2010 "हाल के वैश्विक संकट के बीच केंद्रीय बैंक का तुलनपत्र : भविष्य के मौद्रिक प्रबंध के मामले" पर भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज श्री एस.एम.लोकरे, आर्थिक नीति और अनुसंधान विभाग द्वारा तैयार किया गया "हाल के वैश्विक संकट के बीच केंद्रीय बैंक का तुलनपत्र : भविष्य के मौद्रिक प्रबंध के मामले" शीर्षक एक स्टाफ अध्ययन जारी किया। हाल के वैश्विक वित्तीय संकट ने नीति कार्रवाईयों की एक बौछार शुरू की जो विभिन्न कार्यक्षेत्रों के बीच अपनी मुस्तैदी, मात्रा, परिमाण और अपवादात्मक समन्वय के मामले में कभी नहीं किए गए थे। खासकर मौद्रिक नीति के एक मुख्य लिखत के रूप में केंद्रीय बैंक तुलनपत्र के उपयोग ने हाल के संकट के दौरान अप्रत्याशित रूप से ध्यान खींचा। इस संदर्भ में यह अध्ययन बर्हिगमन की अवधि के दौरान केंद्रीय बैंकों के तुलनपत्रों में आस्तियों और देयताओं के प्रबंध में भविष्य की चुनौतियों और सबकों को रेखांकित करने के अलावा केंद्रीय बैंकों के तुलनपत्रों पर संकट के दौरान की गई नीति कार्रवाईयों के प्रभाव की जाँच करता है। यह भारतीय संदर्भ का विश्लेषण खासकर यह बताते हुए करता है कि किस प्रकार यह उन्नत देशों के केंद्रीय बैंकों में प्रवृत्तियों से अलग रहा है। इस अध्ययन की प्रमुख टिप्पणियाँ निम्नप्रकार हैं: • फेड तथा बैंक ऑफ इंग्लैंड की आस्तियाँ दुगुनी से भी अधिक हो गई है और वह भी कुछ सप्ताहों के भीतर ही हुई हैं जबकि यूरोपियन सेंट्रल बैंक (इसीबी) 30 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। फेड के मामले में यह विद्यमान और नई ऋण सुविधाओं के माध्यम से बैंकों और व्यापारियों को प्रत्यक्ष ऋण; मुद्रा बाज़ार निधियों को अप्रत्यक्ष ऋण; विशेष प्रयोजन सुविधाओं के माध्यम से; वाणिज्यिक पत्रों (सीपी) की खरीद तथा डॉलर स्वैप के अनुरूप विदेशी केंद्रीय बैंकों द्वारा आहरणों में प्रतिबिंबित होता है। • यूरोप में ईसीबी के तुलनपत्र के मुख्य संचालक स्थायी सुविधाओं के साथ परिवर्द्धित ऋण सहायता उपायों को शामिल करते हैं जिसमें संख्या में बढ़ोतरी, परिचालन की बारंबारता और पात्र संपार्श्विकताओं की सूची शामिल रही है। बैंक ऑफ जापान (बीओजे) के संबंध में तुलनपत्रों में परिवर्तन मुख्यत: वाणिज्यिक पत्रों और कंपनी बाण्डों की खरीद के साथ कंपंनी को वित्तीय सहायता को सुविधा प्रदान करने के लिए उपायों को लागू करने के द्वारा किए गए हैं। • केंद्रीय बैंक तुलनपत्रों के आकार में महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों से उत्पन्न कई चुनौतियाँ जैसेकि ऋण में बढ़ोतरी के साथ तुलनपत्रों की जोखिम प्रोफाइल में परिवर्तन, ब्याज दर जोखिमों के अलावा मूल्यांकन और काउंटर पार्टी जोखिम; केंद्रीय बैंकों की आय की स्थिति में परिवर्तन; ऋण देने के लिए बैंकों की इच्छा को प्रतिबंधित करते हुए अत्यधिक आरक्षित निधियाँ; कतिपय प्रकार की आस्तियों के विपणन का अभाव तथा परिचालात्मक लचीलेपन पर हावी दावे और भविष्य की मौद्रिक व्यवस्था पर रोक तथा केंद्रीय बैंकों की परिचालनात्मक और वित्तीय स्वतंत्रता के बारे में आशंकाएं सामने आयी हैं। • सफलतापूर्वक इससे मुक्त होने के लिए परस्पर जुड़ी क्रमबद्धता और केंद्रीय बैंकों से स्पष्ट पत्राचार की अपेक्षा होगी। विशिष्ट पुर्नसंचालन योजनाओं को मध्यावधि नीति लक्ष्य प्राप्त करने पर बाज़ारों को संकेत उपलब्ध कराते समय समायोजन करने की जरुरत है जबकि एक परिपक्व सहायता की वापसी के जोखिम से बचना है क्यांकि स्थितियाँ अभी भी अस्थिर दिखाई देती हैं। • यद्यपि, उभरती हुई कई बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं (ईएमई) ने घरेलू मुद्रा और विदेशी मुद्रा दोनों में चलनिधि के विस्तार के लिए विभिन्न उपाय किए हैं, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं ने केंदीय बैंक तुलनपत्रों के आकार में आक्रमक परिमाणात्मक तथा ऋण सहजता उपायों के अभाव और संकट के बाद पूँजी वर्हिवाह के कारण कई मामलो में अंतर्राष्ट्रीय प्रारक्षित निधि में कमी के कारण उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में उनके प्रतिरूपी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम बढ़े हैं। • भारत में सितंबर 2008 के संकट के समय वित्तीय बाज़ारों पर कुछ दबावों के बावजूद भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्रणाली में पर्याप्त रुपया और विदेशी मुद्रा चलनिध सुनिश्चित किए जाने के साथ बाज़ारों में सामान्य और व्यवस्थित स्थितियाँ कायम की जा सकीं। अन्य देशों के विपरीत भारतीय रिज़र्व बैंक का तुलनपत्र विस्तारित नहीं हुआ क्योंकि दो महत्त्वपूर्ण उपायों ने वित्तीय प्रणाली में प्रचुर चलनिधि डाला जो पारक्षित नकदी निधि अनुपात (सीआरआर) तथा भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ सरकार के बाज़ार स्थिरीकरण योजना शेषों को पुन: जारी करने के रूप में था जिससे वास्तव में तुलनपत्रों में संकुचन हुआ। अजीत प्रसाद प्रेस प्रकाशनी : 2010-2011/519 |
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