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भारतीय रिज़र्व बैंक वर्किंग पेपर श्रृंखला 2/2013 भारत में वित्तीय संरचनाएं और आर्थिक विकास

15 मार्च 2013

भारतीय रिज़र्व बैंक वर्किंग पेपर श्रृंखला 2/2013
भारत में वित्तीय संरचनाएं और आर्थिक विकास

रिज़र्व बैंक ने आज अपनी वेबसाइट पर भारतीय रिज़र्व बैंक की वर्किंग पेपर श्रृंखला के तहत “भारत में वित्तीय संरचनाएं और आर्थिक विकासः एक अनुभवजन्‍य मूल्यांकन” शीर्षक वर्किंग पेपर डाला । यह पेपर डॉ. सत्यानन्द साहू द्वारा लिखा गया है।

जबकि आर्थिक विकास में वित्तीय संरचनाओं की भूमिका अर्थशास्त्र के साहित्य में नया विषय नहीं है, हाल के वैश्विक वित्तीय संकट ने नई चिंताएं उत्पन्न कर दी हैं। भारत में वित्तीय विकास के विभिन्न सूचकों के आकलन से पता चलता है कि बैंक आधारित और बाजार आधारित दोनों मध्यस्थता प्रक्रियाओं में पिछले छह दशकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वित्तीय क्षेत्र के सुधारों ने संगठनात्मक ढ़ांचा, स्वामित्व पद्धति और संस्थाओं के परिचालन के अधिकार क्षेत्र में परिवर्तन किया है और वित्तीय क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न की है। इससे वित्तीय संस्थाएं अस्तित्व बनाए रखने और विकास करने के लिए अपना स्थान परिवर्तन करने के लिए बाध्य हो गई हैं। प्रौद्योगिकी में अत्यधिक प्रगति से बाजार पुरानी प्रणालियों से आधुनिक कारोबार प्रक्रियाओं में जाने लगे हैं जिससे व्यापार करने की गति और लेनदेन लागतों में उल्‍लेखनीय कमी हुई है। तथापि, ऐसा कोई अध्ययन नहीं होगा जो भारत में बैंक आधारित और बाजार आधारित वित्तीय प्रणाली की स्पष्ट तुलना करता हो।

इस संदर्भ में यह दस्तावेज भारत में आर्थिक विकास में वित्तीय संरचनाओं की भूमिका का पुनरावलोकन करने का प्रयास करता है। दस्तावेज में यह तर्क दिया गया है कि भारत में वित्तीय क्षेत्र आपूर्ति-अग्रणी या मांग-अनुगामी क्रम में या दोनों में विभिन्न क्षेत्रों के बीच संसाधनों का एक माध्यम तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है जिससे कि भारत में आर्थिक विकास बढ़ाया जा सके और इसे व्यापक बनाया जा सके।

दस्तावेज के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:

  • जबकि पिछले दशकों में भारतीय बैंकों के ऋण वितरण में तेजी से वृद्धि हुई है, किंतु अभी भी यह विश्व के औसत स्तर से काफी नीचे है और यहां तक कि अपने उभरते बाजार और विकासशील अर्थव्यवस्था समूहों के स्तर से नीचे है। हाल के वर्षों में निधीयन के बाजार आधारित स्रोतों पर अधिक निर्भरता परिलक्षित करते हुए भारतीय स्टॉक मार्केट के बाजार पूंजीकरण में काफी वृद्धि हुई है।

  • निजी क्षेत्र ऋण से वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में एक तरफा ग्रेंगर आकस्मिकता से बैंक मध्यस्थता की आपूर्ति-अग्रणी प्रक्रिया की पुष्टि होती है।

  • तथापि, स्वप्रतिगामी वितरित अंतराल (एआरडीएल) सह-एकीकरण जांच में यह सुझाव है कि भारत के आर्थिक विकास में बैंक आधारित और बाजार आधारित दोनों वित्तीय गहन प्रक्रियाओं की सकारात्मक भूमिका है, फिर भी बैंक आधारित प्रणाली का अधिक प्रभाव है।

  • तुलनात्मक बैंक-संकेंद्रित वित्तीय क्षेत्र में, भारतीय बैंकों के पास अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों में ऋण को माध्‍यम बनाए जाने की और क्षमता है। इसलिए भारतीय बैंकों को वास्तविक क्षेत्र के साथ मजबूत संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता है जिससे कि जारी समयावधि में उच्च विकास स्तर कायम रखने की सामर्थ्य विकसित की जा सके।

अजीत प्रसाद
सहायक महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी : 2012-2013/1547

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