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भारतीय रिज़र्व बैंक वर्किंग पेपर श्रृंखला 9: गतिशील प्रावधानों के संबंध में व्‍यवसाय चक्र दृष्टिकोण : एक भारतीय वृत्त अध्‍ययन

24 सितंबर 2014

भारतीय रिज़र्व बैंक वर्किंग पेपर श्रृंखला 9:
गतिशील प्रावधानों के संबंध में व्‍यवसाय चक्र दृष्टिकोण : एक भारतीय वृत्त अध्‍ययन

भारतीय रिज़र्व बैंक ने आज अपनी वेबसाइट पर भारतीय रिज़र्व बैंक वर्किंग पेपर श्रृंखला* के अंतर्गत “गतिशील प्रावधानों के संबंध में व्‍यवसाय चक्र दृष्टिकोण : एक भारतीय वृत्त अध्‍ययन” शीर्षक से एक वर्किंग पेपर डाला है। यह पेपर तुलसी गोपीनाथ और थंगजम राजेश्‍वर सिंह द्वारा लिखा गया है।

बैंकों का विनियमन समयसापेक्ष दृष्टिकोण के स्‍थान पर चक्र के माध्‍यम से दृष्टिकोण पर अधिकाधिक जोर देते हुए इंटर टेम्‍पोरल हो रहा है। नियामकों के पास उपलब्‍ध विनियामक साधनों में से एक है प्रावधानीकरण। वैश्विक रूप से, प्रावधानीकरण को लागू करने के लिए आगामी रूपरेखा को अपनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। रिज़र्व बैंक ने मार्च 2012 में गतिशील प्रावधानीकरण पर एक चर्चापरक पत्र जारी किया था जिसमें भारत में गतिशील प्रावधानीकरण के संचालन के लिए कार्यप्रणाली का प्रस्‍ताव किया गया था। (/en/web/rbi/-/publications/reports/discussion-paper-on-introduction-of-dynamic-loan-loss-provisioning-framework-for-banks-in-india-660).

मूलत: गतिशील प्रावधानीकरण के दो प्रकार के मॉडल होते है अर्थात बैंकिंग मॉडेल जिसमें बैंकिंग संबंधी आंकड़ों को काम में लिया जाता है और समष्टि-आर्थिक मॉडेल जिसमें जीडीपी संबंधी आंकड़ों का प्रयोग किया जाता है। यह पेपर दूसरे प्रकार के मॉडेल से संबंधित है। क्रेडिट के स्‍थानपर जीडीपी पर निर्भर होने का लाभ यह है कि : अनुभव से यह पाया गया है कि क्रेडिट जीडीपी का अनुगामी होता है। अत: क्रेडिट को लक्षित करने के स्‍थान पर जीडीपी को लक्षित करना अधिक प्रति-चक्रीय रूख का होगा। आगे, सामान्‍यत: उभरती बाजार अर्थव्‍यवस्‍थाओं (इएमई) के परिप्रेक्ष्‍य से और विशेषत: भारतीय परिप्रेक्ष्‍य से ऋण वृद्धि अपने आप में संरचनागत घटकों के कारण उभरनेवाले वित्तीय असंतुलन के प्रति संकेत नहीं करती है। पेपर में क्‍यू1:1996-97 से क्‍यू3:2013-14 तक की अवधि के त्रैमासिक आंकड़ों का प्रयोग किया गया है। भारतीय व्‍यवसाय चक्रों के विस्‍तृत विश्‍लेषण पर आधारित पेपर में गतिशील प्रावधानों के सक्रियण/निष्क्रियकरण जरूरत के साथ वास्‍तविक उत्‍पादन की वृद्धि के विविध चरणों को पहचानने वाले सक्षम मॉडेल का प्रस्‍ताव किया गया है। इस उद्देश्‍य के लिए औसत संभाव्‍य उत्‍पादन वृद्धि दर पर आधारित प्रारंभिक दर निर्धारित की गई है। संभाव्‍य उत्‍पादन के अनुमान के लिए सर्वाधिक सरल और प्रचलित प्रणाली का उपयोग करके अनुभव के आधार पर पेपर में अनुमान किया गया है कि ऐसे संभाव्‍य उत्‍पादन की प्रारंभिक दर 7 प्रतिशत होगी।

पेपर में मॉडेल के बॅक टेस्टिंग में ये प्रमाण पाए गए हैं कि गतिशील प्रावधानों के सक्रियण/निष्क्रियकरण के लिए मॉडेल आधारित संकेत भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा दिसंबर 2004 से शुरू किए गए जोखिम भार में धारणा आधारित वृद्धि अथवा कमी के कालमापन/कतिपय अभिनिर्धारित संवेदनशील क्षेत्रों की मानक आस्तियों पर प्रावधानों का समर्थन करते हैं।

* भारतीय रिज़र्व बैंक ने मार्च 2011 में आरबीआई वर्किंग पेपर श्रृंखला की शुरूआत की थी। ये पेपर रिज़र्व बैंक के स्टाफ सदस्यों की प्रगति में अनुसंधान प्रस्तुत करते हैं और इन्हें अभिमत प्राप्त करने और आगे चर्चा करने के लिए प्रसारित किया जाता है। इन पेपरों में व्यक्त विचार लेखकों के होते हैं, रिज़र्व बैंक के नहीं। अभिमत और टिप्पणियां कृपया लेखकों को भेजी जाएं। इन पेपरों के उद्धरण और उपयोग में इनके अनंतिम गुण का ध्यान रखा जाए।

अजीत प्रसाद
सहायक महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी : 2014-2015/629

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