विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम 1999 - दी जाने वाली सेवाओं के लिए अग्रिम प्रेषण
भारतीय रिज़र्व बैंक ए.पी.(डीआईआर सिरीज़) परिक्रम क्र.65 जनवरी 06. 2003 सेवा में विदेशी मुद्रा के सभी प्राधिकृत व्यापारी महोदया/महोदय, विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम 1999 - दी प्राधिकृत व्यापारियों का ध्यान अक्तूबर 30, 2000 के ए.पी.(डीआईआर सिरीज़) परिपत्र क्र.19 के पैरा 5 की ओर आकृष्ट किया जाता है जिसके अनुसार प्राधिकृत व्यापारी को 25000 अमरीकी डॉलर अथवा उसके समतुल्य से अधिक चालू खाता लेनदेन से संबंधित अग्रिम प्रेषणों के लिए भारत से बाहर स्थित अंतरराष्ट्रीय ख्याति के किसी बैंक की गारंटी अथवा यदि ऐसी गारंटी भारत से बाहर स्थित अंतरराष्ट्रीय ख्याति के किसी बैंक की गारंटी अथवा यदि ऐसी गारंटी भारत के बाहर स्थित अंतरराष्ट्रीय ख्याति के किसी बैंक की गारंटी पर काउंटर गारंटी की गई हो तो भारत में किसी प्राधिकृत व्यापारी से गारंटी लेना पड़ता है। 2. सेवाओं के आयात की प्रक्रिया को और अधिक उदार बनाने के विचार से 25000 अमरीकी डॉलर की सीमा को बढ़ाकर 100,000 अमरीकी डॉलर अथवा उसके समतुल्य करने का निर्णय किया गया है। तदनुसार, प्राधिकृत व्यापारी अब से 100,000 अमरीकी डॉलर तक सभी स्वीकार्य चालू खाता लेनदेन के लिए रिजर्व बैंक की पूर्व अनुमति के बिना अग्रिम प्रेषण की अनुमति दे सकते हैं 3. यदि अग्रिम रकम 100,000 अमरीकी डॉलर अथवा उसके समतुल्य रकम से अधिक हो तो भारत से बाहर स्थित अंतरराष्ट्रीय ख्याति के किसी बैंक की गारंटी अथवा भारत में किस प्राधिकृत व्यापारी से, यदि गारंटी भारत से बाहर स्थित किसी अंतरराष्ट्रीय ख्याति बैंक की गारंटी के लिए काउंटर गारंटी के रूप में जारी की गई हो तो, समुद्रपारीय हिताधिकारी से गारंटी प्राप्त की जाए। 4. प्राधिकृत व्यापारी भी, हिताधिकारी द्वारा भारत में प्रेषक के साथ किए अग्रिम प्रेषण से संबंधित संविदा अथवा करार के अंतर्गत अपने दायित्व को पूरा करना सुनिश्चित करने ओर यदि वे ऐसा करने में असफल होते हैं तो रकम भारत में प्रत्यावर्तित की जाए इसका अनुवर्तन करें। 5. प्राधिकृत व्यापारी इस परिपत्र की विषय वस्तु की जानकारी अपने सभी ग्राहकों को दे दें। 6. इस परिपत्र में समाहित निदेश विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) की धारा 10(4) और धारा 11(1) के अंतर्गत जारी किए गए हैं। भवदीय, (ग्रेस कोशी) |
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