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वर्ष 2006-07 के लिए वार्षिक नीति वक्तव्य की मध्यावधि समीक्षा- विदेश के भारतीय संयुक्त वेंचरों /पूर्णत: स्वाधिकृत अनुषंगी कंपनियों को निधिकृत और अनिधिकृत ऋण सुविधाएं प्रदान करना -

आरबीआइ 2006-07/168
बैंपविवि. आइबीडी.बीसी. सं. 41 /23.37.001/2006-07

6 नवंबर 2006
15 कार्तिक 1928 (शक)

सभी अनुसूचित वाणिज्य बैंक
(क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों एवं स्थानीय क्षेत्र बैंकों को छोड़कर)

महोदय,

वर्ष 2006-07 के लिए वार्षिक नीति वक्तव्य की मध्यावधि समीक्षा- विदेश के भारतीय संयुक्त वेंचरों /पूर्णत: स्वाधिकृत अनुषंगी कंपनियों को निधिकृत और अनिधिकृत ऋण सुविधाएं प्रदान करना - वृद्धि

 

कृपया 8 अप्रैल 2003 का हमारा परिपत्र बैंपविवि. आइबीएस. बीसी. 94/ 23.37.001/ 2002-03 देखें जिसके अनुसार बैंकों को विदेश के भारतीय संयुक्त वेंचरों (जिसमें भारतीय कंपनी की धारिता 51 प्रतिशत से अधिक है)/पूर्णत: स्वाधिकृत अनुषंगी कंपनियों को उनकी अक्षत पूंजीगत निधियों (टीयर घ् और टीयर घ्घ् पूंजी) के 10 प्रतिशत की सीमा तक कतिपय शर्तों के अधीन ऋण/ऋणेतर सुविधाएं प्रदान करने की अनुमति दी गयी थी।

 

2. इस संबंध में 31 अक्तूबर 2006 के गवर्नर के पत्र सं. एमपीडी. बीसी. 286/07.01.279/2006-07 को संलग्न, वर्ष 2006-07 के लिए वार्षिक नीति वक्तव्य की मध्यावधि समीक्षा के पैरा 140 (पैरा की प्रति अनुबंध के रूप में संलग्न है) की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है। जैसा कि उसमें दर्शाया गया है विदेश में भारतीय कारपोरेटों के कारोबार का विस्तार करने की दृष्टि से अब यह निर्णय लिया गया है कि बैंकों द्वारा विदेश के भारतीय संयुक्त वेंचरों (जिसमें भारतीय कंपनी की धारिता 51 प्रतिशत से अधिक है)/पूर्णत: स्वाधिकृत अनुषंगी कंपनियों को दी गयी ऋण और ऋणेतर सुविधाओं पर विवेकपूर्ण सीमा को उनकी अक्षत पूंजीगत निधियों (टीयर I और टीयर घ्घ् पूंजी) के विद्यमान 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत किया जाए।

भवदीय

 

(पी. विजय भास्कर)

मुख्य महाप्रबंधक


वार्षिक नीति वक्तव्य 2006-07 की मध्यावधि समीक्षा
के पैरा 140 का उद्धरण

(ड.) संयुक्त वेंचरों /भारतीय कारपोरेटों की पूर्णत: स्वाधिकृत अनुषंगी कंपनियों को भारतीय बैंकों द्वारा निधिकृत और अनिधिकृत सीमाएं : वृद्धि

 

140. अप्रैल 2003 में, भारतीय बैंकों को विदेश के भारतीय संयुक्त वेंचरों (जेवी)/पूर्णत: स्वाधिकृत अनुषंगी कंपनियों को अपनी अक्षत पूंजीगत निधियों (टीयर घ् और टीयर घ्घ्) के 10 प्रतिशत तक ऋण/ऋणेतर सुविधाएं प्रदान करने की अनुमति दी गयी जिनपर कतिपय शर्तें लागू होंगी। भारतीय कारपोरेट कारोबार को विदेश में विस्तारित करने में सुविधा इस दृष्टि से प्रस्तावित है कि:

 

बैंकों द्वारा ऋण और ऋणेतर सुविधाओं संबंधी विवेकसम्मत सीमा वर्तमान के 10 प्रतिशत से बढ़ाकर बैंकों की अक्षत पूंजीगत विधियों (टीयर घ् और टीयर II पूंजी) के 20 प्रतिशत कर दी जाए।

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