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भारतीय रिज़र्व बैंक बुलेटिन – अक्तूबर 2025

आज, रिज़र्व बैंक ने अपने मासिक बुलेटिन का अक्तूबर 2025 अंक जारी किया। इस बुलेटिन में द्विमासिक मौद्रिक नीति वक्तव्य (अक्तूबर 2025), पाँच भाषण, पाँच आलेख और वर्तमान सांख्यिकी को शामिल किया गया हैं।

पांच आलेख हैं: I. अर्थव्यवस्था की स्थिति; II. आघात-सहनीयता और बहाली: भारत का निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र; III. आईपीओ के माध्यम से भारतीय लघु और मध्यम उद्यमों द्वारा धन जुटाना: हालिया रुझान और गतिविधियां; IV. विश्वास के लिए अनुपालन: केंद्रीय बैंकों के लिए एक डेटा गुणवत्ता मॉडल; और V. स्टील पर संकट: भारत पर डंपिंग के प्रभाव को समझना

I. अर्थव्यवस्था की स्थिति

वैश्विक अनिश्चितता बढ़ गई है। अमेरिका में, सितंबर में व्यापार और आर्थिक नीति दोनों में अनिश्चितता बढ़ी है। तथापि, वैश्विक संवृद्धि दर व्यापक तौर पर स्थिर रही है। अमेरिका-चीन व्यापार तनाव और अमेरिकी सरकार के लंबे समय तक बंद के कारण, उछाल के एक चरण के बाद, अक्तूबर में निवेशकों के मनोभावों में गिरावट आई। व्यापक वैश्विक अनिश्चितता और कमजोर बाह्य माँग के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने आघात-सहनीयता दिखाई। उच्च आवृत्ति वाले संकेतक, शहरी माँग में सुधार और ग्रामीण माँग में मजबूती की ओर इशारा करते हैं। हेडलाइन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति सितंबर में तेज़ी से कम हुई, जो जून 2017 के बाद से इसका सबसे निचला स्तर है।

II. आघात-सहनीयता और बहाली: भारत का निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र

स्निग्धा योगिन्द्रन, सुक्ति खांडेकर, राजेश कावेड़िया और कमल गुप्ता द्वार

यह अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे भारत के निजी कॉर्पोरेट्स ने कोविड महामारी के आघातों का सामना किया और मज़बूती से उभरे। सूचीबद्ध गैर-सरकारी गैर-वित्तीय कंपनियों के वित्तीय आंकड़ों पर आधारित, यह अध्ययन महामारी के बाद की अवधि में अनुकूलनशीलता, लाभप्रदता और तुलन पत्र की मजबूती के साथ वैश्विक आघातों का सामना करने की इस क्षेत्र की क्षमता को रेखांकित करता है।

मुख्य बातें:

  • महामारी के बाद कॉर्पोरेट बिक्री में तेजी से उछाल आया, जो महामारी अवधि के दौरान दर्ज संकुचन की तुलना में 2021-22 में 32.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ शीर्ष स्तर पर पहुंच गई, तथा 2024-25 में 7.2 प्रतिशत पर स्थिर हो गई।
  • निवल लाभ 2020-21 के ₹2.5 ट्रिलियन से बढ़कर 2024-25 में ₹7.1 ट्रिलियन हो गया। परिणामस्वरूप, निवल लाभ मार्जिन 2020-21 के 7.2 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 10.3 प्रतिशत हो गया।
  • कॉर्पोरेट्स ने उच्च लाभ के पूंजीकरण के समर्थन से अपने तुलन पत्र से ऋण को कम करना जारी रखा, तथा विभिन्न आकार की कंपनियों में इक्विटी की तुलना में ऋण अनुपात में सुधार हुआ।
  • विनिर्माण फर्मों के लिए ब्याज व्याप्ति अनुपात में उल्लेखनीय सुधार हुआ, जो कोविड-पश्चात अवधि के दौरान औसतन 7.7 तक पहुंच गया, जो मजबूत ऋण चुकौती क्षमता को दर्शाता है।
  • बड़ी कंपनियों ने लाभप्रदता बढ़ाई, जबकि मध्यम और छोटी कंपनियों ने बड़ी कंपनियों की तुलना में ऋण चुकौती क्षमता में अधिक सुधार प्रदर्शित किया।

III. आईपीओ के माध्यम से भारतीय लघु और मध्यम उद्यमों द्वारा धन जुटाना: हालिया रुझान और गतिविधिय

भाग्यश्री चट्टोपाध्याय और श्रोमोना गांगुली द्वारा

लघु एवं मध्यम उद्यम (एसएमई) भारत की आर्थिक संवृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अक्सर औपचारिक वित्त तक पहुँचने में बाधाओं का सामना करते हैं। हाल के वर्षों में, समर्पित एसएमई एक्सचेंज, प्रारंभिक सार्वजनिक प्रस्तावों (आईपीओ) के माध्यम से धन जुटाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरे हैं। यह आलेख वित्त वर्ष 2023-24 और वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान भारत में एसएमई आईपीओ के निष्पादन और रुझानों की पड़ताल करता है, उनके विकास, बाजार व्यवहार और निवेशकों की प्रतिक्रिया का विश्लेषण करता है।

मुख्य बातें:

  • भारत में एसएमई आईपीओ बाजार में वित्त वर्ष 2023-24 और वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान गतिविधियों में तेज़ उछाल देखा गया, जिसे मज़बूत खुदरा सहभागिता और अनुकूल बाज़ार मनोभावों का समर्थन प्राप्त हुआ। इस दौरान, एसएमई आईपीओ ने उच्च अति -अभिदान स्तर और लिस्टिंग लाभ दर्ज किए।
  • समग्र बाजार में तेजी, तथा आईपीओ बाजार में भुगतान और निपटान तंत्र में प्रगति जैसे समष्टि आर्थिक और नीतिगत कारकों ने इस उछाल को बढ़ावा दिया।
  • आईपीओ से प्राप्त अधिकांश राशि का उपयोग एसएमई द्वारा पूंजी वृद्धि या कार्यशील पूंजी के लिए किया गया। मजबूत लिस्टिंग लाभ के बावजूद, इन एसएमई शेयरों का लिस्टिंग के बाद का प्रदर्शन निवेशकों के लिए अवसरों और जोखिमों, दोनों को दर्शाता है।

IV. विश्वास के लिए अनुपालन: केंद्रीय बैंकों के लिए एक डेटा गुणवत्ता मॉडल

देबासिस नंदी और सुजीश कुमार द्वार

केंद्रीय बैंक के कामकाज में विनियमित संस्थाओं से बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र से संबंधित भारी मात्रा में डेटा एकत्र करना शामिल है। जटिल डेटा पारितंत्र में, डेटा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना केंद्रीय बैंकों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है। चूँकि केंद्रीय बैंक को विभिन्न प्रकार के डेटा - विनियामक, पर्यवेक्षी और सांख्यिकीय - एकत्र करने का कार्य सौंपा गया है, इसलिए यह आलेख विनियमित संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत डेटा की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने हेतु एक डेटा गुणवत्ता सूचकांक (डीक्यूआई) के निर्माण हेतु एक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

मुख्य बातें:

  • इस आलेख में वर्णित प्रक्रिया आठ डेटा गुणवत्ता आयामों का उपयोग करके डीक्यूआई के निर्माण हेतु एक चरणबद्ध दृष्टिकोण की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। यह भारतीय बैंकिंग पर्यवेक्षी परिदृश्य में आमतौर पर लागू किए जाने वाले चार डेटा गुणवत्ता आयामों को व्यापक बनाती है, जिसमें डेटा संग्रह और प्रसार प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
  • इस आलेख में प्रदान किया गया डीक्यूआई ढांचा केंद्रीय बैंकों और विनियामकों को संस्थागत विश्वसनीयता, विनियामक और पर्यवेक्षी दक्षता और सार्वजनिक विश्वास को व्यवस्थित रूप से बढ़ाने के लिए डेटा की गुणवत्ता की निगरानी और सुधार करने में सक्षम बनाता है।
  • यह ढांचा संस्थागत डेटा प्रशासन में डेटा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए डेटा निर्माण और संग्रहण प्रक्रियाओं में स्वचालन के महत्व पर प्रकाश डालती है।

V. इस्पात पर संकट: भारत पर डंपिंग के प्रभाव को समझना

अनिर्बान सान्याल और संजय सिंह द्वार

2023-24 और 2024-25 के दौरान प्रमुख वैश्विक इस्पात उत्पादकों से सस्ते आयात और डंपिंग के कारण भारत के इस्पात क्षेत्र को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इस पृष्ठभूमि में, यह आलेख भारत के घरेलू इस्पात उत्पादन और खपत पर सस्ते आयात के समग्र स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करता है। इसके अलावा, विभिन्न आयात स्थलों में औसत आयात लोच के माध्यम से इस्पात आयात की मूल्य संवेदनशीलता का मूल्यांकन किया गया है।

मुख्य बातें:

  • इस्पात के आयात में वृद्धि देखी गई है, जिसका मुख्य कारण इस्पात के कम आयात मूल्य हैं तथा इससे इस्पात के घरेलू उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
  • भारत के इस्पात आयात की औसत मूल्य लोच 0.73-1.01 के बीच है, जिससे पता चलता है कि इस्पात उत्पादों की मज़बूत घरेलू माँग को देखते हुए, आयात तीव्रता मुख्यतः मूल्य प्रभावों के कारण बढ़ी हुई थी। आयात से कम मूल्य के कारण बढ़ी हुई इस्पात माँग को पूरा करने के लिए घरेलू स्तर पर उत्पादित इस्पात का उपयोग बढ़ा।
  • वैश्विक उत्पादकों द्वारा सस्ते इस्पात की डंपिंग से घरेलू इस्पात उत्पादन को खतरा हो सकता है, जिसे उपयुक्त नीतिगत उपायों से कम किया जा सकता है। हाल ही में सुरक्षा शुल्क लगाने की पहल आयात डंपिंग के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है।

बुलेटिन के आलेखों में व्यक्त विचार लेखकों के हैं और भारतीय रिज़र्व बैंक के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

(ब्रिज राज)     
मुख्य महाप्रबंधक

प्रेस प्रकाशनी: 2025-2026/1355

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