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The Ombudsman Scheme for Digital Transactions, 2019

One can file a complaint with the Ombudsman by writing on a plain paper and sending it to the concerned office of the Ombudsman by post/fax/hand delivery. One can also file it by email to the Ombudsman for Digital Transactions. (For contact details please click here) A complaint form along with the scheme is also available on RBI's website, though, it is not mandatory to use this format.

उत्तर. प्रेषक बैंक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रेषक और लाभार्थी दोनों के लिए एलईआई सूचना प्राप्त की गई है। अनुपयुक्त या बिना एलईआई वाले किसी आवक लेनदेन को लाभार्थी बैंक द्वारा अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, क्रेडिट के बाद, विप्रेषक और लाभार्थी दोनों बैंकों को 50 करोड़ और उससे अधिक के सभी भुगतान लेनदेन के लिए वैध और सत्यापित एलईआई जानकारी बनाए रखनी चाहिए।

उत्तर: हां। व्यापारी को पीओएस टर्मिनल द्वारा उत्पन्न एक मुद्रित रसीद प्रदान करना आवश्यक है। यदि माल की खरीद के साथ सुविधा का लाभ उठाया जाता है, तो उत्पन्न रसीद अलग से नकद निकासी की राशि को इंगित करेगी।
12 मई 2017 को भारत सरकार द्वारा अधिसूचित किए गए विनिर्दिष्ट बैंक नोट (अधिहरण किए गए नोटों को जमा किया जाना) नियम, 2017 के अनुसार अधिहरण किए गए विनिर्दिष्ट बैंक नोटों के अतिरिक्त यह सुविधा निवासी भारतीयों के लिए उपलब्ध नहीं है क्योंकि छूट अवधि 31 मार्च, 2017 को समाप्त हो चुकी है ।
समाधान ढांचे को निवेश एक्सपोजर सहित पात्र-उधारकर्ताओं को ऋण देने वाली संस्थाओं के सभी एक्सपोजर के समाधान के लिए लागू किया जा सकता है। हालांकि, किसी विशेष एक्सपोजर के संबंध में संबंधित वित्तीय क्षेत्र के विनियामकों और भारतीय रिज़र्व बैंक के अन्य विभागों द्वारा जारी सभी दिशा-निर्देश भी लागू रहेंगे ।

उत्तर: नहीं, कार्ड-जारीकर्ता अवैतनिक करों/लेवी/शुल्कों को मूल नहीं बनाएँगे अर्थात ब्याज या कोई अन्य शुल्क नहीं लगाएंगे। चूंकि एमडी के पैरा 9(ख)(ii) के अंतर्गत निहित प्रावधान 01 अक्टूबर 2022 से प्रभावी हो गया है, कार्ड जारीकर्ता 01 अक्टूबर 2022 से बिल किए गए अवैतनिक करों/लेवी/शुल्कों का पूंजीकरण नहीं करेंगे।

उत्तर: परिसमापन के तहत बैंक के मामले में, जमाकर्ता को दावे के लिए बैंक के परिसमापक से संपर्क करना होगा और परिसमापक निम्नलिखित प्रक्रिया के अनुसार दावे का निपटान करेगा।

परिदृश्य 1: डीआईसीजीसी द्वारा शामिल की गई जमा राशि पर दावा- यदि किसी ग्राहक/जमाकर्ता की जमा राशि डीईए निधि में स्थानांतरण के समय डीआईसीजीसी बीमा द्वारा कवर की गई थी, तो परिसमापक डीआईसीजीसी से दावा की गई राशि के बराबर राशि का दावा कर सकता है (अर्थात  वर्तमान में अर्जित राशि ब्याज सहित ₹5 लाख तक, यदि उसी अधिकार और क्षमता में लागू है[1]), और फिर जमाकर्ता को भुगतान करें। यदि उपरोक्त जमा राशि डीआईसीजीसी के बीमा कवर से अधिक है, तो परिसमापक केवल प्रतिपूर्ति के आधार पर डीआईसीजीसी बीमा कवर से अधिक राशि (अर्थात, ₹5 लाख से अधिक) का दावा करेगा।(अर्थात, परिसमापक सभी लागू आवश्यकताओं को पूरा करने के तहत  जमाकर्ता को ऐसी राशि का भुगतान करेगा और उसके बाद प्रतिपूर्ति के लिए डीईए निधि में दावा प्रस्तुत करेगा)

उदाहरण 1: एक ग्राहक/जमाकर्ता का बैंक में ₹4 लाख का जमा दावा था (उपार्जित ब्याज सहित), जो अब परिसमापन के अधीन है। जमा राशि का बीमा डीआईसीजीसी द्वारा उस समय किया गया था जब उक्त अदावी जमा को डीईए निधि में स्थानांतरित किया गया था। अब, यदि वह परिसमापन प्रक्रिया के दौरान इसका दावा करता/करती है, तो निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा:

  1. ग्राहक/जमाकर्ता/ उत्तराधिकारी परिसमापक को अपनी जमा राशि के लिए दावा प्रस्तुत करता है।
  2. परिसमापक आवश्यक सहायक दस्तावेजों के साथ डीईए निधि से ₹4 लाख के बराबर का दावा करता है। 
  3. डीईए निधि परिसमापक को बीमाकृत जमा के बराबर राशि का भुगतान करेगा। (इस मामले में, अर्थात  ₹4 लाख, क्योंकि डीआईसीजीसी बीमा कवर ₹5 लाख तक उपलब्ध है)।
  4. डीईए निधि से राशि प्राप्त करने के बाद, परिसमापक, ग्राहक/जमाकर्ता को भुगतान करेगा अर्थात् ₹4 लाख

उदाहरण 2: एक ग्राहक/जमाकर्ता का बैंक में ₹6 लाख (उपार्जित ब्याज सहित) का जमा दावा था, जो अब परिसमापन के अधीन है। डीआईसीजीसी द्वारा जमा राशि का बीमा उस समय किया गया था जब उसकी अदावी जमा राशि को डीईए निधि में स्थानांतरित कर दिया गया था। अब, यदि वह परिसमापन प्रक्रिया के दौरान इसका दावा करता है, तो निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा :

  1. परिसमापक को ग्राहक/जमाकर्ता/ उत्तराधिकारी अपना/अपनी जमा राशि के लिए दावा प्रस्तुत करता है। 
  2. परिसमापक आवश्यक सहायक दस्तावेजों के साथ डीईए निधि से ₹6 लाख के बराबर तक का दावा करता है। .
  3. परिसमापक को डीईए निधि बीमाकृत जमा के बराबर राशि का ही भुगतान करेगा। (इस मामले में,अर्थात, ₹5 लाख, क्योंकि डीआईसीजीसी  बीमा कवर ₹5 लाख तक उपलब्ध है)।
  4. परिसमापक शेष राशि (अर्थात  ₹1 लाख) के लिए सभी लागू आवश्यकताओं को पूरा करने के अधीन जमाकर्ता को भुगतान करेगा और फिर प्रतिपूर्ति के माध्यम से डीईए निधि से इसके लिए दावा करेगा।

परिदृश्‍य 2: डीआईसीजीसी में शामिल नहीं की गई जमा राशि पर दावा: डीईए निधि में स्थानांतरण के दौरान डीआईसीजीसी[2] द्वारा शामिल नहीं की गई जमा राशि के संबंध में  डीईए निधि द्वारा परिसमापक को भुगतान केवल प्रतिपूर्ति के आधार पर किया जाएगा (अर्थात, परिसमापक ग्राहक/जमाकर्ता को राशि निपटान करने के बाद ही प्रतिपूर्ति के रूप में मांग कर सकता है) जैसाकि उपरोक्‍त उदाहरण 2(iv) में उल्‍लेख किया गया है।


[2]डीआईसीजीसी अधिनियम की धारा 2(जी) के तहत - अर्थात विदेशी सरकार, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, संबंधित नए बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अथवा बैंकिंग कंपनी अथवा सहकारी बैंक)

No. The requirement is that not less than 51 per cent of the voting equity shares of the NOFHC shall be held by companies in the Promoter Group, in which the public hold not less than 51 percent of the voting equity of such companies. If 10 independent individuals form a Group, then such a Group cannot satisfy the above criteria laid down for holding the NOFHC. Additionally, such newly formed Promoter Group would not be able to meet one of the ‘Fit and Proper’ criteria, which requires Promoters/Promoter Groups to have a successful track record of running their business for at least 10 years. Essentially, the intention is that existing groups should set up banks and not groups set up for this purpose. However, it is clarified that individuals belonging to the Promoter Group can participate in the voting equity shares of NOFHC. While any such individual along with his relatives (as defined in Section 6 of the Companies Act 1956) and along with entities in which he and / or his relatives hold not less than 50 per cent of the voting equity shares, can hold voting equity shares not exceeding 10 per cent of the total voting equity shares of the NOFHC, all such individuals (along with their relatives and companies as specified above) irrespective of their numbers, cannot hold more than 49 per cent of the voting equity shares of the NOFHC (since the companies forming part of the Promoter Group whereof companies in which the public hold not less than 51 per cent of the voting equity shares shall hold not less than 51 per cent of the total voting equity shares of the NOFHC).[ para 2 ( C ) (ii) (a) and (b) of the guidelines]

आवेदन पत्र जारीकर्ता बैंक/ एसएचसीआईएल कार्यालय/ चुनिंदा डाकघरों/ एजेंटों द्वारा उपलब्‍ध कराए जाएंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट से भी यह फार्म डाउनलोड किया जा सकता है। बैंक ऑनलाइन आवेदनपत्र भरने की सुविधा भी दे सकते हैं।

उत्तर: हाँ। निवासी व्यष्टि को उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्तियों के माध्यम से एलआरएस के अंतर्गत किए गए सभी लेनदेन के लिए स्थायी खाता संख्या (पैन नंबर) प्रदान करना अनिवार्य है।

उत्तर: मैगनेटिक स्ट्रिप कार्ड में कार्ड पर मौजूद मैगनेटिक स्ट्रिप पर कार्ड का डेटा संग्रहीत होता है जबकि ईएमवी चिप और पिन कार्ड में डेटा चिप में संग्रहीत किया जाता है। एक संपर्क रहित एनएफसी कार्ड में कार्ड को कार्ड रीडर के पास रखा जाता है जिससे कार्ड की पहचान की जाती है। ईएमवी चिप और पिन कार्ड और संपर्क रहित एनएफसी कार्ड को मैगनेटिक स्ट्रिप वाले कार्ड की तुलना में सुरक्षित माना जाता है।

परिपत्र के अनुबंध का "राज्य" कॉलम शाखा के कॉलम से मेल खाता है, क्योंकि उधारकर्ता का पता कॉलम स्वाभाविक रूप से उस राज्य को दर्शाता है जिससे उधारकर्ता संबंधित है।

उत्तर: परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों (एएमसी) को आरबीआई के ऑनलाइन वेब-आधारित पोर्टल 'FLAIR' जिसका लिंक https://flair.rbi.org.in है, के माध्यम से विदेशी देयताओं और परिसंपत्तियों (एफएलए) पर वार्षिक रिटर्न प्रत्येक वर्ष 15 जुलाई तक जमा करना आवश्यक है।

उत्तर: 24 सितंबर 2021 के एमडी-टीईएल के अनुसार, प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंकों (पीयूसीबी), राज्य सहकारी बैंकों (एसटीसीबी) और केंद्रीय सहकारी बैंकों (सीसीबी) को दबावग्रस्त ऋणों के पात्र हस्तांतरणकर्ताओं के रूप में मान्यता दी गई है। ‘बहुराज्यीय शहरी सहकारी बैंकों द्वारा प्रतिभूतिकरण कंपनी/पुनर्निर्माण कंपनी (एससी/आरसी) को वित्तीय आस्तियों की बिक्री’ पर दिशा-निर्देश संबंधी दिनांक 28 मार्च 2014 के परिपत्र के प्रासंगिक प्रावधान को निरस्त कर दिए गए हैं, जिनके अनुसार केवल बहुराज्यीय सहकारी बैंक ही एआरसी को दबावग्रस्त आस्तियों को बेच सकते हैं। तदनुसार, सभी सहकारी बैंकों को एमडी-टीईएल और अन्य मौजूदा विनियामक अनुदेशों के प्रावधानों का अनुपालन करते हुए दबावग्रस्त आस्तियों को एआरसी को अंतरित करने की अनुमति है।

लिंकेज के माध्यम से सीमा पार प्रेषण लेनदेन करने के लिए एक दिन में ₹60,000 की दैनिक लेनदेन सीमा है (लगभग 1,000 एसजीडी के बराबर)।
जनसाधारण एक बार में ₹20,000/- की सीमा तक ₹2,000/- मूल्य वर्ग के बैंकनोट बदल सकते हैं।

उत्तर: नहीं। एनबीएफसी-पी2पी प्लेटफॉर्म पर व्यवस्थित ऋण पर डीएलजी की अनुमति नहीं है।

उत्तर: एनएसबीएल और प्रभु मनी ट्रांसफर का स्थान और पता भारत-नेपाल प्रेषण सुविधा योजना के लिए प्रक्रियात्मक दिशानिर्देशों के साथ-साथ भारत में एनईएफटी-सक्षम शाखाओं के साथ भी उपलब्ध है। भारत-नेपाल विप्रेषण सुविधा योजना के लिए प्रक्रिया संबंधी दिशानिर्देश आरबीआई की वेबसाइट /documents/87730/39016390/84489.pdf पर उपलब्ध हैं।

उत्तर. गैर-निधि आधारित सुविधाओं के मामले में, प्राधिकृत व्यापारी बैंकों को इस प्रकार के निर्गम करते समय ही एलईआई संबंधी अपेक्षाओं का अनुपालन सुनिश्चित करना होगा।

उत्तर: ढांचे के तहत जुटाई गई जमाराशियों को निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961 और उसके तहत बनाए गए विनियमों, समय-समय पर किए गए संशोधनों के अनुसार डीआईसीजीसी द्वारा कवर किया जाता है।

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पृष्ठ अंतिम बार अपडेट किया गया: दिसंबर 11, 2022

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